भदोही सरकारी अस्पताल में दलित महिला की सड़क पर प्रसव को लेकर विवाद

भदोही में एक दलित महिला के सरकारी अस्पताल में प्रसव के लिए भर्ती न होने और सड़क पर बच्चे को जन्म देने का मामला सामने आया है, जिसने समाज में नंबरीकरण और भेदभाव को लेकर बहस छेड़ दी है। यह घटना 29 सितंबर की है जब 20 वर्षीय रानी वनवासी को अस्पताल ने भर्ती करने से इनकार कर दिया।
क्या हुआ घटना के समय
रानी वनवासी को प्रसव पीड़ा के दौरान अस्पताल में भर्ती नहीं किया गया और जब परिवार आवेदिका को वापस ले जा रहा था, तब महिला के प्रसव पीड़ा अचानक तेज हो गई। वे अस्पताल के बाहर ही सड़क पर रुकीं, जहां उनके साथ आई महिलाओं ने साड़ी और चादर से उनकी परछाई छिपाई, ताकि उन्हें गोपनीयता मिले और वहीं सड़क किनारे जन्म दिया।
परिवार का आरोप है कि अस्पताल के कर्मी जाति के आधार पर उन्हें इलाज और भर्ती नहीं दे रहे थे। इस मामले ने दलित विरोध और Untouchability (अस्पृश्यता) के आरोपों को जन्म दिया है। विपक्षी दलों ने राज्य सरकार पर निशाना साधा है और इस घटना को न्याय प्रणाली की विफलता बताया है।
प्रशासन की प्रतिक्रिया और कार्रवाई
अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने बताया कि पीड़िता का हीमोग्लोबिन स्तर करीब पांच ग्राम प्रति डेसिलीटर था, जो अत्यधिक एनीमिया दर्शाता है। महिला को मिर्जापुर के उच्च स्तर के संस्थान में रेफर किया गया था, लेकिन तब तक प्रसव हो गया। उन्होंने कहा कि घटना की सूचना मिलते ही वे मौके पर पहुंचे और उचित चिकित्सा सहायता प्रदान की। महिला और नवजात दोनों स्वस्थ हैं और अब जिला अस्पताल में इलाज जारी है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने यह भी कहा कि आंशिक लापरवाही के दोषी कर्मियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है और परिवार की अधिकांश शिकायतें तथ्यात्मक रूप से सही नहीं पाईं।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता सुनील सिंह यादव ने कहा कि यह घटना 79 साल बाद भी सरकार प्रणाली में मौजूद अस्पृश्यता को दर्शाती है, जिसका कारण प्रशासनिक तानाशाही और भाजपा सरकार के संरक्षण में फयूसल तत्व हैं। वहीं, कांग्रेस नेता अजय कुमार लल्लू ने इसे सभ्य समाज में अस्वीकार्य बताया है।
यह मामला न केवल दलित अधिकारों के मुद्दे को बल देता है, बल्कि उत्तर प्रदेश में सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधा और जातिगत भेदभाव की समस्या को भी उजागर करता है।
आगे की जांच जारी है और प्रशासन ने दोषियों को सजा देने की बात कही है। इस घटना ने पूरे प्रदेश में सामाजिक न्याय पर बहस को महत्वपूर्ण बना दिया है।




