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मलारिक्कल में गुलाबी कुमुदनी का बढ़ता प्रकोप, पारिस्थितिकी को खतरा

केरल के मलारिक्कल में गुलाबी कुमुदनी के प्रचुर फूलों ने सैकड़ों पर्यटकों और स्थानीय टूर ऑपरेटरों को खुशी दी है, लेकिन जैव विविधता विशेषज्ञों के लिए यह चिंता का विषय बना हुआ है। जुलाई से शुरू होने वाली और तीन महीने तक चलने वाली इस फूलों की अर्थव्यवस्था स्थानीय पारिस्थितिकी पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है।

अध्ययन से मिले पर्यावरणीय खतरे

केरल स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड (KSBB) के लिए किए गए दो साल के अध्ययन में पता चला है कि यह जलजीव कुमुदनी बिना किसी नियंत्रण के बढ़ रही है, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी प्रभावित हो रही है। जवाहरलाल नेहरू ट्रॉपिकल बोटैनिक गार्डन एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट के वरिष्ठ वैज्ञानिक रमेशकुमार के.बी. ने बताया कि 2018 के बाढ़ के बाद यह पौधा इस क्षेत्र में पहली बार विस्तृत रूप से उभरा।

उन्होंने कहा कि यह पौधा पहले इस क्षेत्र में मौजूद नहीं था, और शोध अभी जारी है ताकि पता चल सके कि यह किस प्रजाति का है और क्या यह किसी नर्सरी से भागा हुआ है या किसी मौजूदा प्रजाति का रूपांतर है। इसके लिए जेनेटिक और आणविक स्तर पर अध्ययन किया जा रहा है।

स्थानीय पारिस्थितिकी पर संकट

KSBB के अध्यक्ष एन. अनिल कुमार ने कहा कि इस पौधे की अनियंत्रित वृद्धि चेतावनी है और इसके फैलाव को रोकना बेहद जरूरी है, ताकि यह अन्य जल निकायों तक न पहुंचे। उन्होंने कहा कि इसके जल में रहने वाले प्रजातियों पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है और ऐसी प्रजातियों को नियंत्रित करना आवश्यक है ताकि स्थानीय वनस्पति नष्ट न हो।

अध्ययन के अनुसार, कुमुदनी के कारण चूहों की संख्या बढ़ी है और स्थानीय जल पौधों की प्रजातियां कम हो गई हैं। शवपदार्थ के सड़ने से मीथेन जैसे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी चिंता का विषय है। रमेशकुमार ने कहा कि लाखों कुमुदनी के फूलों की मौजूदगी से परागण में भी परिवर्तन होने की संभावना है, जो आगे चलकर भूमि पर होने वाली फसलों की परागण प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

उन्होंने बताया कि इस पौधे ने जल प्रवाह की गति को कम कर दिया है, जिससे जल में कीचड़ जम गया है और जल प्रदूषित हो रहा है। इस वजह से पारंपरिक जल परिवहन भी प्रभावित हुआ है।

एक और चिंता कुमुदनी के बड़े पत्तों द्वारा पानी की सतह को ज़्यादातर ढक देना है, जिससे पानी के भीतर प्रकाश प्रवेश कम हो जाता है। यह जल जीवों के आवास को नुकसान पहुंचा सकता है।

स्थानीय लोग हालांकि इसका आर्थिक लाभ उठा रहे हैं। हर साल जुलाई में पड़ी की फसल के बाद ये गुलाबी फूल खिलते हैं और इससे पर्यटन अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। मलारिक्कल के दो मुख्य धान के खेतों में ये कुमुदनी दिखाई देते हैं, जिनमें 600 और 300 किसान क्रमशः जुड़े हुए हैं।

मलारिक्कल टूरिज्म सोसायटी के सचिव शाजिमोन वट्टपल्लिल ने बताया कि इस समय तकरीबन 250 देशी नावें पर्यटकों को कुमुदनी के बीच जल सैर कराती हैं। उन्होंने कहा कि आसपास के किसानों ने भी इस मॉडल की नकल करने में रुचि दिखाई, लेकिन इसे सीधे कॉपी करना संभव नहीं है। इससे क्षेत्र में रहने वाले महिलाएं और किसान आर्थिक रूप से लाभान्वित हो रहे हैं। मेनाचिल-मीनामथायर-कोडूर नदी प्रोजेक्ट के समन्वयक के. अनिलकुमार के अनुसार, पिछले साल करीब ₹5 करोड़ की आमदनी हुई। यह आय स्थानीय लोगों और किसानों के लिए अतिरिक्त स्रोत बन गई है।

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