धार्मिक

रवैये की ताकत का सदुपयोग जीवन में सफलताओं के लिए आवश्यक

जीवन में रवैये का अहम रोल होता है, जो हमारी ऊंचाइयों को तय करता है। सही रवैया खुद से और दूसरों के प्रति कैसा होना चाहिए, यह सवाल प्राचीन ग्रंथों से जुड़ा है। संस्कृत में दो शब्द ‘मित्र’ और ‘मैत्री’ हैं, जहाँ मित्र का मतलब है ‘दोस्त’ और मैत्री का अर्थ ‘मित्रता’ या ‘मिलनसारिता’।

भगवद गीता में मैत्री का महत्व

भगवद गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि जो सभी प्राणियों के प्रति द्वेषरहित होते हैं, मित्रवत और करुणा से भरे होते हैं, स्वार्थरहित और अहंकार-रहित होते हुए सुख-दु:ख में समान भाव रखते हैं, वे क्षमाशील होते हैं। यहाँ मित्र शब्द नहीं, बल्कि मैत्री की बात हुई है, जो सीमित संबंध की बजाय एक व्यापक गुण है।

मैत्री वह गुण है जिससे फूल हर किसी को अपनी खुशबू देता है, चाहे वह सामाजिक, आर्थिक या बौद्धिक स्तर पर कोई भी हो, चाहे उसकी सराहना हो या न हो। यह व्यावहारिकता और सीमाओं से परे एक सहज प्यार और अपनत्व है।

स्वयं के प्रति मैत्री और व्यक्तिगत विकास

एक विकसित हुआ इंसान भी फूल की तरह होना चाहिए, जो बिना किसी भेदभाव के सबके साथ दोस्ताना व्यवहार करे, ज्ञान और वस्तुएं साझा करे। मैत्री निस्वार्थ प्यार, देखभाल और क्षमा की भावना है। यह आत्म-क्षमा में भी काम आती है, जिससे हम अपनी गलतियों पर बहुत ज्यादा पछतावा नहीं करते और आगे बढ़ पाते हैं।

गिल्ट महसूस करना और खुद को सताना किसी व्यक्ति को सुधारने में मदद नहीं करता। इसे छोड़ कर खुद से दोस्ताना व्यवहार यानी मैत्री से आगे बढ़ना ज्यादा फायदेमंद होता है। इस प्रकार की मैत्री से हम अपने अतीत के घावों को समझदारी से पार करते हैं।

अपराध के मामलों में भी केवल सजा देना समाधान नहीं, क्योंकि अपराध के कारण शारीरिक स्तर से कहीं गहरे होते हैं। ऐसी स्थिति में मैत्री की भावना, जिसमें करुणा और दया शामिल हैं, न केवल व्यक्ति को सुधारने में सहायक होती है बल्कि समाज में स्थायी बदलाव भी लाती है।

चाहे कोई डॉक्टर हो या इंजीनियर, अपने क्षेत्र की नई जानकारियों के साथ बने रहना जरूरी है। यह ज्ञान ऊर्जा की तरह है जो हमें जीवन में आगे बढ़ने की ताकत देता है। इसी तरह, आत्म-विकास के लिए प्राप्त ज्ञान से जुड़ा रहना भी आवश्यक है ताकि हम कमजोर न पड़ें।

भगवान कृष्ण कहते हैं कि किसी को खुद की मदद खुद करनी चाहिए, खुद को गिराना नहीं चाहिए क्योंकि आत्मा, अर्थात् खुद, दोस्त भी है और कभी-कभी दुश्मन भी। इसलिए सबसे पहले अपने प्रति मैत्री विकसित करनी चाहिए। यह समझ हमें जीवन में संतुलित और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने में मदद करती है।

Source

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button