महाराष्ट्र के माराठवाड़ा में बाल विवाह की समस्या बनी चुनौती

महाराष्ट्र के माराठवाड़ा क्षेत्र में बाल विवाह की परंपरा आज भी प्रचलित है, जो बच्चियों के भविष्य को प्रभावित कर रही है। यहां के किसान परिवार आर्थिक दबाव, सामाजिक सुरक्षा और परंपरागत सोच के कारण अपनी बेटियों की बाल विवाह की ओर मजबूर होते हैं। यह प्रक्रिया न केवल बच्चियों को शिक्षा से वंचित करती है बल्कि उन्हें हिंसा और अन्याय का शिकार भी बनाती है।
माराठवाड़ा क्षेत्र में बाल विवाह का तथ्य और कारण
माराठवाड़ा में कई परिवारों की बेटियों को किशोरावस्था में ही शादी के बंधन में बांध दिया जाता है। यहाँ की कमजोर आर्थिक स्थिति, मुसलसल प्रवास, और बेटियों की सुरक्षा को लेकर आशंकाएं बाल विवाह को बढ़ावा देते हैं। सामाजिक रूप से परिवारों में प्रतिद्वंद्विता और परिवार की प्रतिष्ठा बनाए रखने की चिंता अंततः बाल विवाह को सामान्य बना देती है।
किर्ती की कहानी इसके उदाहरण है, जो अपने मन के विरुद्ध जबरन शादी के डर से पीड़ित है। उसकी दादी सुमन बताती हैं कि बाल विवाह ही बेटी की सुरक्षा का एकमात्र उपाय माना जाता है क्योंकि मजदूर परिवारों की बेटियां प्रवास के दौरान असुरक्षित होती हैं। यही सोच पूरे इलाके में आम है।
बाल विवाह से जुड़ी चुनौतियां और सरकारी प्रयास
बाल विवाह से उत्पन्न समस्याओं में बच्चियों का घरेलू हिंसा का सामना, शिक्षा का अभाव, स्वास्थ्य जोखिम और सामाजिक असमानता शामिल हैं। 2006 के बाल विवाह निषेध अधिनियम और 2023 की भारतीय न्याय संहिता में बाल विवाह को गैरकानूनी घोषित किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी बाल विवाह कराने वाले पति को दुष्कर्म के तहत दंडित करने की बात कही है।
फिर भी, माराठवाड़ा क्षेत्र में बाल विवाह की दर अधिक है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस क्षेत्र के जिलों में बाल विवाह की घटनाएं ज्यादा होती हैं। महाराष्ट्र में बाल विवाह रोकथाम अधिकारी भी ज्यादा तैनात हैं। सरकार की बाल विवाह मुक्त भारत अभियान 2030 तक इस समस्या को समाप्त करने का लक्ष्य रखती है।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बाल विवाह के त्वरित बढ़ने में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त शिकारियों की भूमिका नकारात्मक है। ये लोग नाबालिग लड़कियों को दबाव में लाकर उनका शोषण करते हैं, जिससे परिवार दबाव में आकर जल्दी शादी कर देते हैं। इसी कारण लड़कियों का शिक्षा से जुड़ाव टूटता है और वे हिंसा के शिकार बनती हैं।
इसके अलावा, बाल विवाह व्यापार और बेटी बेचने जैसी विकृत प्रवृत्तियां भी यहां देखी गई हैं। इसके पीछे जाति भेदभाव के बजाय दुल्हन की कमी और बालिकाओं की अपराधीकरण के कारण बाजार उमड़ता है। बाल विवाह में लड़कियों को वस्तु की तरह देखा जाता है, जिनका सौदा किया जाता है।
बहुत सी लड़कियां अपने घरों से भाग जाती हैं या जबरन निकाह के बाद अधिकतर घरेलू हिंसा का सामना करती हैं। इस कारण महिलाएं और बालिकाएं जेल या आश्रम में भी सुरक्षित नहीं हैं। सामाजिक स्तर पर इन लड़कियों के लिए सहारा और सुरक्षा नदारद है।
माराठवाड़ा क्षेत्र में बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथा को समाप्त करने के लिए शिक्षा और जागरूकता सबसे आवश्यक कदम हैं। कई लड़कियां आज पढ़ाई के प्रति उत्सुक हैं और समाज में सुधार की उम्मीद जगाती हैं। हालांकि, परिवार और समाज के रूढ़िवादी सोच से लड़ना आसान नहीं है। ऐसे संघर्षों को जीतने के लिए कानूनी संरक्षण, प्रशासनिक प्रयास और सामाजिक समर्थन की जरूरत है।




