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तुवालु में जलवायु परिवर्तन से कोरल मरकर द्वीप खतरे में

तुवालु के प्रवासी द्वीप जो प्रशांत महासागर के बीच स्थित हैं, जलवायु परिवर्तन के कारण गंभीर संकट में हैं। यहाँ के कोरल रीफ जो द्वीपों को आकार देते थे, वे लगभग पूरी तरह मर चुके हैं। यह स्थिति अक्टूबर 5 को फिजी में आयोजित COP सम्मेलन से पहले सामने आई है।

कोरल रीफ पर गंभीर प्रभाव

समुद्री जीवविज्ञानी ऑस्टिन बोवден-केर्बी ने बताया कि जो कोरल सिस्टम द्वीपों के निर्माण में महत्वपूर्ण था, वह अब खत्म हो चुका है। 2024 में आए समुद्री ताप तापन (marine heatwave) ने तुवालु के लगभग 99.9% कोरल को नष्ट कर दिया। यह विनाश प्रदूषण या मछली पकड़ने के कारण नहीं, बल्कि सीधे जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है।

कोरल के नुकसान का प्रभाव तुवालु की भौगोलिक स्थिति पर भी दिखाई देता है। बढ़ते समुद्र स्तरों के चलते वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस पूरे द्वीपसमूह का रहने योग्य रहना इस सदी के अंत तक मुश्किल हो सकता है।

स्थानीय मछली पकड़ने और जीवन पर असर

स्थानिक वैज्ञानिक रजनील सिंह ने कहा कि जलवायु परिवर्तन ने तुवालु के 10,600 नागरिकों के लिए समुद्री जीव का वितरण प्रभावित किया है। पुराने समय में लेदर्स रेड स्नैपर जैसे मछलियों को पकड़ा करते थे, लेकिन अब ऐसी मछलियाँ कम मिलने लगी हैं और उनकी साइज़ भी कम हो गई है।

तुवालु के मत्स्य मंत्री से दिसंबर में की गई बातचीत में यह तथ्य सुनना उनके लिए कठिन था। सिंह ने बताया कि मंत्री इस विनाश की तस्वीरें देखकर और स्थिति के बारे में सुनकर हैरान रह गए थे।

यह स्पष्ट है कि तुवालु के कोरल रीफ, जो इनके अस्तित्व की नींव थे, को जलवायु परिवर्तन ने इतना गंभीर क्षति पहुँचाई है कि यह क्षेत्र आने वाले समय में अस्थिर हो सकता है। समुद्र का स्तर बढ़ने के कारण इसके भविष्य को खतरा है और यह एक चेतावनी है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन पर त्वरित कदम उठाने की जरूरत है।

इस घटना से पता चलता है कि किस तरह वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के कारण छोटे द्वीप देश भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं। तुवालु के मामले में कोरल रीफ की मौत का मतलब है कि न केवल प्रकृतिक संसाधन कमजोर हो रहे हैं, बल्कि स्थानीय समुदाय की जीवनशैली भी प्रभावित हो रही है।

वैश्विक नेताओं के लिए यह एक चुनौती है कि वे इस तरह के पर्यावरणीय संकट को समझें और इस पर उचित कार्रवाई करें ताकि तुवालु जैसे द्वीपों का अस्तित्व बचाया जा सके। यह घटना दुनिया को याद दिलाती है कि जलवायु परिवर्तन का खामियाजा सबसे नाजुक जगहों को भुगतना पड़ रहा है।

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