भारत में एग्री-वोल्टेइक तकनीक के विकास में कई बाधाएं, नीति व समन्वय की कमी बड़ी चुनौती: पुलकित श्रोत्री
कृषि और स्वच्छ ऊर्जा को जोड़ने वाली एग्री-PV तकनीक में अपार संभावनाएं, लेकिन ढांचागत व नीतिगत अड़चनें आड़े

सब तक एक्सप्रेस।
लखनऊ/दिल्ली। भारत में कृषि-वोल्टेइक (एग्री-PV) तकनीक कृषि और स्वच्छ ऊर्जा के बीच संतुलन स्थापित करने की एक प्रभावी पहल के रूप में उभर रही है, लेकिन इसके विकास में कई गंभीर चुनौतियां बाधा बनी हुई हैं। यह बात ऊर्जा एवं नीति विशेषज्ञ पुलकित श्रोत्री ने एग्री-PV सेक्टर की मौजूदा स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कही।
उन्होंने बताया कि भारत का कृषि क्षेत्र देश की लगभग 55 प्रतिशत भूमि को कवर करता है, जो सकल मूल्य वर्धन (GVA) में करीब 18.3 प्रतिशत योगदान देता है और 42 प्रतिशत से अधिक आबादी की आजीविका से जुड़ा है। वहीं भारत ने वर्ष 2025 में 250 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल कर ली है और 2030 के 500 गीगावाट नॉन-फॉसिल लक्ष्य का आधा रास्ता तय कर लिया है। ऐसे में एग्री-PV तकनीक “तीसरी फसल” के रूप में भोजन और ऊर्जा सुरक्षा को एक साथ आगे बढ़ाने का मजबूत माध्यम बन सकती है।
पुलकित श्रोत्री ने कहा कि एग्री-PV तकनीक भूमि उपयोग को लेकर कृषि और ऊर्जा के बीच होने वाले टकराव को समाप्त करने की क्षमता रखती है, लेकिन तकनीकी, नीतिगत और वित्तीय समस्याओं के कारण इसका व्यापक प्रसार नहीं हो पा रहा है।
उन्होंने बताया कि तकनीकी स्तर पर DISCOMS और ट्रांसमिशन सिस्टम की सीमाएं बड़ी बाधा हैं। दिन के समय अतिरिक्त सौर ऊर्जा और शाम के समय बिजली की कमी के कारण ग्रिड संतुलन की समस्या बनी रहती है। स्मार्ट इन्वर्टर, रिएक्टिव पावर मैनेजमेंट और फीडर सेग्रीगेशन के अभाव में यह समस्या और गंभीर हो जाती है।
नीतिगत मोर्चे पर उन्होंने कहा कि कृषि और गैर-कृषि गतिविधियों को एक साथ करने में मौजूदा भूमि कानून बाधा बन रहे हैं। अस्पष्ट परिभाषाएं, एक समान टैरिफ व्यवस्था, थकाऊ ओपन एक्सेस नियम और अपर्याप्त फीड-इन टैरिफ एग्री-PV प्रोजेक्ट्स की व्यवहार्यता को कमजोर करते हैं। वहीं रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए सीमित बजट, फसल विविधता और माइक्रो-एनवायरनमेंट पर डेटा की कमी भी बड़ी चुनौती है।
पर्यावरणीय और सामाजिक पहलुओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मौजूदा एग्री-PV तकनीकें स्थानीय इकोसिस्टम और जैव विविधता के साथ पर्याप्त तालमेल नहीं बिठा पा रही हैं। साथ ही हितधारकों के बीच समन्वय और सार्वजनिक विमर्श की कमी के कारण तकनीक के लाभ आमजन तक नहीं पहुंच पा रहे हैं।
वित्तीय चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि उच्च प्रारंभिक लागत, सस्ते ऋण की कमी, बिना गारंटी ऋण तंत्र का अभाव और कमजोर क्षमता निर्माण एग्री-PV को अपनाने में बाधा बन रहे हैं।
समाधान के तौर पर पुलकित श्रोत्री ने मजबूत नीतिगत ढांचा, स्मार्ट इन्वर्टर और ग्रिड सुधार, सब्सिडी के बजाय ओनरशिप-आधारित समर्थन, आकर्षक फीड-इन टैरिफ, R&D में निवेश, इंटर-डिपार्टमेंटल समन्वय और किसानों की ट्रेनिंग पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन सुधारों से DISCOMs, किसानों और डेवलपर्स तीनों को लाभ होगा।
उन्होंने यह भी बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू और कृषि लोड को एग्री-PV की ओर शिफ्ट करने से दिन के समय की पीक डिमांड घटेगी, DISCOMs पर वित्तीय दबाव कम होगा और उत्सर्जन में भी कमी आएगी। वहीं किसान और डेवलपर बिजली बिक्री व फसल विविधीकरण के माध्यम से अपनी आय बढ़ा सकेंगे।
उन्होंने निष्कर्ष देते हुए कहा कि यदि सरकारी स्तर पर समन्वित सुधार किए जाएं तो एग्री-PV तकनीक भारत में सतत विकास, ऊर्जा सुरक्षा और किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत आधार बन सकती है।



