
सब तक एक्सप्रेस | राष्ट्रीय
नई दिल्ली। दिल्ली हिंसा से जुड़े मामलों में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की लंबी न्यायिक हिरासत को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। दोनों आरोपी बीते करीब पाँच वर्षों से जेल में हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की ओर से की गई टिप्पणियों के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है।
शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक जेल में रहने के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष के कथित “संरक्षित गवाहों” की गवाही दर्ज होने के बाद ही जमानत याचिका पर विचार किया जा सकता है। इस प्रक्रिया के चलते जमानत अर्जी में और समय लगने की संभावना जताई जा रही है।
उमर खालिद के समर्थकों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि उनके खिलाफ मामला तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे के समय दिए गए एक भाषण से जोड़ा गया है, जबकि उनके अनुसार अब तक ठोस सबूत सामने नहीं आए हैं। समर्थकों का यह भी आरोप है कि लंबे समय तक बिना ट्रायल जेल में रखना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
इस मामले को लेकर राजनीतिक हलकों में भी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। आलोचकों का कहना है कि कड़े आतंकवाद विरोधी कानूनों का दुरुपयोग पहले भी हुआ है और अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में कई निर्दोष युवाओं को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। वहीं, सरकार और अभियोजन पक्ष का तर्क है कि मामला गंभीर है और कानूनी प्रक्रिया के तहत ही आगे बढ़ रहा है।
उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत को लेकर चल रही यह बहस आने वाले दिनों में और तेज होने की संभावना है, क्योंकि इसे नागरिक अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया से जोड़कर देखा जा रहा है।



