केंद्र सरकार के निर्देशों को लेकर अजमेर दरगाह के 3000 खादिमों में नाराजगी है।

अजमेर दरगाह में लाइसेंस विवाद: केंद्र सरकार और खादिमों के बीच बढ़ता टकराव
विवाद की शुरुआत: परंपरा बनाम व्यवस्था
राजस्थान के अजमेर में स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया में सूफी परंपरा, भाईचारे और आस्था का प्रतीक मानी जाती है। यहां हर रोज हजारों की संख्या में जायरीन जियारत के लिए पहुंचते हैं। लेकिन इसी ऐतिहासिक और पवित्र स्थल पर अब केंद्र सरकार और दरगाह से जुड़े खादिमों के बीच बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। यह विवाद खादिमों के लिए अनिवार्य की गई लाइसेंस व्यवस्था को लेकर है, जिसे मानने से लगभग तीन हजार खादिमों ने साफ इनकार कर दिया है।
सरकार का फैसला: क्यों जरूरी बताई गई लाइसेंस व्यवस्था
केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने दरगाह में व्यवस्था सुधारने के उद्देश्य से खादिमों के लिए लाइसेंस प्रक्रिया लागू करने का निर्णय लिया। मंत्रालय का कहना है कि दरगाह में आने वाले जायरीनों के साथ कई बार अभद्र व्यवहार, मारपीट और जबरन पैसे वसूलने की शिकायतें सामने आती रही हैं। इन्हीं घटनाओं पर रोक लगाने के लिए यह कदम उठाया गया है।
मंत्रालय द्वारा नियुक्त दरगाह कमेटी के नाजिम ने निर्देश जारी कर कहा कि अब बिना लाइसेंस के कोई भी खादिम दरगाह परिसर में सेवाएं नहीं दे सकेगा। इसके लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया शुरू की गई और अंतिम तिथि 5 जनवरी तय की गई।
खादिमों का विरोध: आवेदन से पूरी तरह दूरी
लाइसेंस व्यवस्था लागू होते ही खादिम संगठनों ने इसका कड़ा विरोध शुरू कर दिया। हैरानी की बात यह रही कि आवेदन की अंतिम तारीख निकल जाने के बावजूद एक भी खादिम ने लाइसेंस के लिए आवेदन नहीं किया। दरगाह से जुड़े लगभग तीन हजार खादिम इस फैसले को अपने पारंपरिक अधिकारों पर सीधा हमला मान रहे हैं।
खादिमों का कहना है कि वे पीढ़ियों से दरगाह की सेवा करते आ रहे हैं और उनकी भूमिका को किसी सरकारी आदेश से सीमित नहीं किया जा सकता। इसी वजह से उन्होंने सामूहिक रूप से इस प्रक्रिया का बहिष्कार कर दिया।
‘तुगलकी फरमान’ का आरोप
खादिमों की प्रमुख संस्था अंजुमन सैयद जागदान और अंजुमन शेख जादगान ने इस आदेश को ‘तुगलकी फरमान’ करार दिया है। अंजुमन सैयद जागदान के सचिव सैयद सरवर चिश्ती ने साफ कहा कि खादिम इस आदेश को किसी भी हाल में स्वीकार नहीं करेंगे।
उनका कहना है कि अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय दरगाह के संचालन में आर्थिक रूप से कोई योगदान नहीं देता, फिर भी वह नियम थोप रहा है। खादिमों का तर्क है कि दरगाह की व्यवस्था और कर्मचारियों का खर्च दरगाह की आय से ही चलता है, ऐसे में मंत्रालय का हस्तक्षेप अनुचित है।
कानूनी पक्ष: अधिनियम का हवाला
इस पूरे विवाद में कानूनी पहलू भी सामने आया है। सीमा सुरक्षा बल के पूर्व डीआईजी बिलाल खान सहित कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि दरगाह ख्वाजा साहब अधिनियम, 1955 की धारा 11(एफ) के तहत दरगाह प्रशासन को लाइसेंस जैसी व्यवस्था लागू करने का अधिकार प्राप्त है।
उनका मानना है कि यह व्यवस्था किसी के धार्मिक अधिकारों को खत्म नहीं करती, बल्कि केवल प्रशासनिक नियंत्रण और निगरानी का माध्यम है। कानून के अनुसार, यदि इसका उद्देश्य जायरीनों की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखना है, तो इसे गलत नहीं ठहराया जा सकता।
जायरीनों की भारी भीड़ और बढ़ती शिकायतें
अजमेर जिला प्रशासन के अनुसार, दरगाह में रोजाना औसतन एक लाख जायरीन जियारत के लिए पहुंचते हैं। उर्स जैसे विशेष अवसरों पर यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। हाल ही में 17 से 27 दिसंबर तक चले उर्स के दौरान करीब 14 लाख से अधिक जायरीन दरगाह पहुंचे थे।
इतनी बड़ी भीड़ के कारण अव्यवस्था की स्थिति बनना आम है। कई बार जायरीनों से जबरन चढ़ावा लेने, धमकाने और मारपीट जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं। प्रशासन का कहना है कि लाइसेंस व्यवस्था से ऐसे मामलों पर अंकुश लगाया जा सकेगा और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को दरगाह परिसर से दूर रखा जा सकेगा।
प्रशासन की दलील: अनुशासन और पारदर्शिता जरूरी
प्रशासन का मानना है कि लाइसेंस प्रणाली लागू होने से दरगाह में अनुशासन, जवाबदेही और पारदर्शिता आएगी। इससे यह भी तय किया जा सकेगा कि कौन खादिम वास्तव में सेवा कर रहा है और कौन केवल अवैध वसूली में लगा हुआ है।
अधिकारियों का कहना है कि सही तरीके से काम करने वाले खादिमों को इससे कोई नुकसान नहीं होगा, बल्कि उनकी पहचान और सुरक्षा और मजबूत होगी। साथ ही जायरीनों को भी एक सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल मिलेगा।
खादिमों की आशंका: अधिकारों में कटौती का डर
खादिमों को आशंका है कि लाइसेंस व्यवस्था के जरिए भविष्य में उनकी संख्या सीमित की जा सकती है या उनकी परंपरागत भूमिका को कमजोर किया जा सकता है। उनका कहना है कि यह सिर्फ शुरुआत है और आगे चलकर सरकार और सख्त नियंत्रण लागू कर सकती है।
इसी डर के कारण खादिम इस व्यवस्था को अपने अस्तित्व और अधिकारों के खिलाफ मान रहे हैं और किसी भी तरह का समझौता करने को फिलहाल तैयार नहीं दिख रहे।
समाधान की संभावना: संवाद की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद टकराव से नहीं, बल्कि संवाद से सुलझाया जा सकता है। यदि सरकार खादिम संगठनों से बातचीत कर उनकी आशंकाओं को दूर करे और लाइसेंस प्रक्रिया में कुछ लचीलापन दिखाए, तो स्थिति बेहतर हो सकती है।
वहीं, खादिमों को भी यह समझना होगा कि इतनी बड़ी संख्या में आने वाले जायरीनों की सुरक्षा और सुविधा सर्वोपरि है। इसके लिए कुछ प्रशासनिक सुधार जरूरी हो सकते हैं।
निष्कर्ष
अजमेर दरगाह में खादिमों की लाइसेंस व्यवस्था को लेकर उठा विवाद परंपरा और आधुनिक प्रशासन के बीच टकराव का उदाहरण बन गया है। एक ओर सरकार अनुशासन और पारदर्शिता की बात कर रही है, तो दूसरी ओर खादिम अपने ऐतिहासिक अधिकारों की रक्षा में डटे हुए हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह मामला बातचीत से सुलझता है या कानूनी लड़ाई का रूप लेता है।



