अंतरराष्ट्रीय

ब्रिटेन में आर्थिक मजबूती की मिसाल बने भारतीय: अध्ययन

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के अध्ययन से पता चला है कि ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोगों की संपत्ति में एक दशक में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो श्वेत ब्रिटिश समुदाय से भी आगे निकल गए हैं। वहीं, पाकिस्तानी मूल के लोगों की औसत संपत्ति में गिरावट आई है, जबकि अन्य समुदायों की संपत्ति स्थिर रही।

HighLights

  1. ब्रिटेन में भारतीय मूल की संपत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि।
  2. पाकिस्तानी समुदाय की औसत संपत्ति में तेज गिरावट।
  3. शिक्षा, रोजगार और संपत्ति निर्माण आर्थिक दिशा तय करते हैं।

भारतीय मूल के लोगों की संपत्ति में जबरदस्त उछाल और पाकिस्तानी समुदाय की संपत्ति में गिरावट देखी गई है। ब्रिटेन में भारतीय मूल के लोगों ने बीते एक दशक में आर्थिक मजबूती की नई मिसाल कायम की है।

लंदन स्कूल आफ इकोनामिक्स (एलएसई) के ताजा अध्ययन के अनुसार, भारतीय मूल के वयस्कों की औसत संपत्ति में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है, जबकि पाकिस्तानी मूल के लोगों की संपत्ति में इसी अवधि में साफ गिरावट दर्ज की गई है।

एलएसई के सेंटर फॉर एनालिसिस ऑफ सोशल एक्सक्लूजन की रिपोर्ट बताती है कि 2012-14 के बाद संपत्ति में वास्तविक बढ़त मुख्य रूप से भारतीय मूल और श्वेत ब्रिटिश समुदायों तक सीमित रही। इसके उलट, पाकिस्तानी मूल के लोगों की औसत संपत्ति में तेज गिरावट देखी गई, जबकि बांग्लादेशी और अश्वेत अफ्रीकी-कैरेबियाई समुदायों की संपत्ति लगभग शून्य के आसपास बनी रही। श्वेत ब्रिटिश समुदाय को भी पीछे छोड़ चुके हैं।

भारतीय मूल के लोग ब्रिटिशर्स से आगे

भारतीय अध्ययन में यह भी सामने आया कि ब्रिटेन में जन्मे भारतीय मूल के लोग आर्थिक प्रदर्शन में न केवल पहली पीढ़ी के भारतीयों से आगे हैं, बल्कि कई मामलों में श्वेत ब्रिटिश समुदाय को भी पीछे छोड़ चुके हैं। घर और अन्य परिसंपत्तियों में निवेश ने भारतीय समुदाय को दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता प्रदान की है।

रिपोर्ट के मुताबिक, संपत्ति असमानता बढ़ने का प्रमुख कारण आय से ज्यादा संपत्ति और घर के स्वामित्व तक पहुंच है। जहां भारतीय समुदाय ने समय रहते संपत्ति बाजार में जगह बनाई, वहीं पाकिस्तानी समुदाय सीमित आय, कम बचत और देर से घर खरीदने जैसी चुनौतियों से जूझता रहा।

शिक्षा, रोजगार तय करती है आर्थिक दिशा शोधकर्ता डॉ. एलेनी करागियानाकी ने कहा कि यह अध्ययन दिखाता है कि शिक्षा, रोजगार और परिसंपत्ति निर्माण में समय पर भागीदारी किसी भी समुदाय की आर्थिक दिशा तय करती है। यह शोध ब्रिटिश एकेडमी के सहयोग से किया गया है और इसमें 2012-14 से 2021-23 तक के आंकड़ों का विश्लेषण शामिल है।

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