उत्तर प्रदेशटॉप न्यूजबड़ी खबरराज्यराष्ट्रीयरोजगारसीतापुरसोनभद्र

शास्त्र सम्मत और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से मनाएं मकर संक्रांति

सनातन संस्था ने पर्व के धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक महत्व पर डाला प्रकाश

सब तक एक्सप्रेस।
लखनऊ। मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने वाला सनातन संस्कृति का महत्वपूर्ण उत्सव है। यह बातें सनातन संस्था की प्राची जुवेकर ने कहीं। उन्होंने बताया कि हिंदू धर्म में प्रत्येक पर्व मनुष्य को प्रकृति और आध्यात्मिक चेतना के निकट ले जाने का माध्यम है, और मकर संक्रांति इसका प्रमुख उदाहरण है।
प्राची जुवेकर ने बताया कि इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण का आरंभ होता है। इसे देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है—दक्षिण भारत में पोंगल, सिंधी समाज में तिरमौरी, गुजरात में उत्तरायण और महाराष्ट्र व उत्तर भारत में मकर संक्रांति के रूप में।
उन्होंने कहा कि यह पर्व आपसी मतभेद भुलाकर प्रेम और सौहार्द बढ़ाने का संदेश देता है। “तिलगुड़ लो, मीठा बोलो” की परंपरा इसी भाव को दर्शाती है। मकर संक्रांति प्रायः 14 जनवरी को मनाई जाती है और वर्ष 2026 में भी यह पर्व 14 जनवरी को ही पड़ेगा।
प्राची जुवेकर ने बताया कि मकर संक्रांति से रथ सप्तमी तक का समय पर्वकाल माना जाता है, जिसमें दान, जप, तप और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार इस अवधि में किए गए पुण्य कर्मों का फल कई गुना अधिक मिलता है। इस दिन तिल, गुड़, अन्न, वस्त्र, पात्र आदि का दान करने की परंपरा है।
उन्होंने कहा कि मकर संक्रांति पर सुवासिनियों को हल्दी-कुंकू और सात्त्विक वस्तुएं देना “वाण देना” कहलाता है। इसमें धार्मिक ग्रंथ, देवताओं के चित्र, अगरबत्ती, सौभाग्य की वस्तुएं आदि देना श्रेष्ठ माना गया है। अधार्मिक वस्तुएं देने से बचना चाहिए।
उन्होंने ‘सुगड़’ की परंपरा का भी उल्लेख किया, जिसमें मिट्टी के छोटे घड़ों की पूजा कर उन्हें सुहागिन महिलाओं, तुलसी माता और स्वयं के लिए रखा जाता है। यह परंपरा विशेष रूप से महाराष्ट्र में प्रचलित है।
प्राची जुवेकर ने बताया कि इस दिन तीर्थ स्नान का भी विशेष महत्व है। गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी नदियों में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। तिलगुड़ का सेवन करने से आत्मशुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मकर संक्रांति के दिन काले वस्त्र पहनने का शास्त्रों में कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए इस दिन काले कपड़े पहनने से बचना चाहिए।
अंत में उन्होंने लोगों से अपील की कि मकर संक्रांति को शास्त्र सम्मत, सात्त्विक और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से मनाएं, ताकि यह पर्व समाज में सकारात्मकता, सद्भाव और आध्यात्मिक उन्नति का संदेश दे सके।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!