राजस्थान

विधानसभा सत्र से पहले सियासी टकराव, दिशानिर्देशों पर स्पीकर देवनानी बनाम विपक्ष

सत्र से पहले बढ़ा राजनीतिक तापमान

राजस्थान विधानसभा के आगामी सत्र से पहले जारी किए गए दिशानिर्देशों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। विपक्ष ने इन दिशानिर्देशों को लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए सरकार और विधानसभा अध्यक्ष पर गंभीर आरोप लगाए हैं। वहीं, विधानसभा स्पीकर वासुदेव देवनानी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि लंबे समय से चली आ रही संसदीय प्रक्रियाओं को गलत ढंग से पेश कर एक झूठा नैरेटिव गढ़ा जा रहा है।

स्पीकर का पलटवार

जयपुर में आयोजित प्रेस वार्ता में स्पीकर देवनानी ने स्पष्ट किया कि विधानसभा सत्र से पहले कोई नए नियम लागू नहीं किए गए हैं। उन्होंने कहा कि यह भ्रम फैलाया जा रहा है कि विधायकों के अधिकारों में कटौती की गई है, जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है। प्रश्नकाल, शून्यकाल और सवाल पूछने की प्रक्रिया पहले की तरह ही जारी रहेगी।

“लोकतंत्र की हत्या” जैसे आरोप गंभीर

देवनानी ने पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “लोकतंत्र की हत्या” जैसे शब्दों का इस्तेमाल बेहद गंभीर मामला है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र कैसे कमजोर होता है, यह बात अशोक गहलोत बेहतर जानते होंगे। हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे पूर्व मुख्यमंत्री का सम्मान करते हैं, लेकिन लगता है कि सत्र से पहले जारी बुलेटिन को सही तरीके से पढ़ा नहीं गया।

गहलोत का आरोप: विधायकों की आवाज दबाई जा रही

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इन दिशानिर्देशों को अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा था कि एक विधायक केवल अपने क्षेत्र का नहीं, बल्कि पूरे राज्य का प्रतिनिधि होता है। ऐसे में राज्यस्तरीय नीतिगत मुद्दों या पुराने मामलों पर सवाल पूछने से रोकना संसदीय लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है।

सवाल पूछने की प्रक्रिया पर सफाई

स्पीकर देवनानी ने स्पष्ट किया कि सवालों की स्वीकार्यता से जुड़े नियम पहले से ही तय हैं और इनमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। उन्होंने बताया कि ये नियम 25 जनवरी 2020 को जारी बुलेटिन संख्या-20 के अनुसार ही लागू हैं। सवालों की संख्या, प्रारूप या सीमा में किसी तरह का संशोधन नहीं किया गया है।

पांच साल पुराने मामलों पर परंपरा

देवनानी ने कहा कि पांच साल से पुराने मामलों पर सवाल न पूछने की परंपरा इसलिए है ताकि विभाग समयबद्ध और तथ्यात्मक जवाब दे सकें। इसका उद्देश्य मंत्रियों को बचाना नहीं, बल्कि सदन की कार्यकुशलता बनाए रखना है।

‘तुच्छ सवाल’ शब्द पर विवाद

‘तुच्छ’ शब्द को लेकर उठे विवाद पर स्पीकर ने कहा कि मामूली या तुच्छ विषयों पर सवाल न पूछने का प्रावधान राजस्थान विधानसभा के नियमों में 1956 से मौजूद है। यही व्यवस्था लोकसभा और अन्य विधानसभाओं में भी लागू है।

डिजिटलीकरण ही एकमात्र बदलाव

स्पीकर ने अंत में कहा कि हालिया बदलाव केवल सवालों और पर्चियों के डिजिटलीकरण तक सीमित है। सत्र पूरी तरह पारंपरिक संसदीय नियमों और स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं के तहत ही संचालित होगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!