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लखनऊ। यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन्स को लेकर विश्वविद्यालय परिसरों में जारी विवाद, भ्रम और ध्रुवीकरण के बीच लखनऊ विश्वविद्यालय के संविधान स्थल पर संवाद की ओर से एक अध्ययन चक्र का आयोजन किया गया। यह आयोजन किसी औपचारिक अकादमिक गतिविधि के बजाय एक विशेष सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में आयोजित किया गया, जिसका उद्देश्य छात्रों को विचार-विमर्श और आपसी संवाद के लिए एक सुरक्षित मंच प्रदान करना था।
अध्ययन चक्र में स्नातक, परास्नातक और पीएचडी स्तर के छात्रों ने भाग लिया। विभिन्न शैक्षणिक और सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए छात्रों ने यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन्स को गहराई से पढ़ते हुए उनके प्रावधानों, संभावनाओं और सीमाओं पर गंभीर चर्चा की। बातचीत न तो भावनात्मक उबाल तक सीमित रही और न ही नारेबाजी तक, बल्कि तर्कपूर्ण और संवेदनशील संवाद के रूप में सामने आई।
चर्चा के दौरान भेदभाव की परिभाषा पर विशेष जोर दिया गया। छात्रों ने इस बात को रेखांकित किया कि भेदभाव को केवल व्यक्तिगत घटना नहीं, बल्कि एक संस्थागत समस्या के रूप में समझना आवश्यक है। रेगुलेशन्स के तहत प्रस्तावित संस्थागत ढांचे, प्रतिनिधित्व, स्वायत्तता और शिकायत निवारण तंत्र में शक्ति के केंद्रीकरण जैसे मुद्दों पर भी विस्तार से विचार किया गया।
हाशिये पर खड़े छात्रों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जातिगत और लैंगिक भेदभाव अक्सर सूक्ष्म रूपों में सामने आता है, जो कक्षा व्यवहार, मूल्यांकन प्रक्रियाओं, मार्गदर्शन तक पहुंच और अनौपचारिक सत्ता संरचनाओं में दिखाई देता है। इन अनुभवों ने यह स्पष्ट किया कि जब तक हाशिये के अनुभवों को केंद्र में नहीं रखा जाता, समानता की कोई भी चर्चा अधूरी रह जाती है।
अध्ययन चक्र में यह भी सामने आया कि यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन्स के खिलाफ तीव्र प्रतिक्रिया केवल प्रशासनिक या प्रक्रियात्मक चिंताओं का परिणाम नहीं है, बल्कि भेदभाव के अस्तित्व को प्रतीकात्मक रूप से स्वीकार करने से उपजी असहजता भी इसका एक बड़ा कारण है। छात्रों का मानना था कि ये नियम भले ही सत्ता का मूलभूत पुनर्वितरण न करते हों, लेकिन वे बिना जवाबदेही चले आ रहे विशेषाधिकारों को जरूर चुनौती देते हैं।
इस आयोजन ने वैकल्पिक कक्षाओं की आवश्यकता को भी रेखांकित किया। वक्ताओं और प्रतिभागियों ने कहा कि वर्तमान समय में विश्वविद्यालयों में आलोचनात्मक सोच, नैतिक विवेक और संवाद की जगह लगातार संकुचित की जा रही है। ऐसे माहौल में संवाद जैसी पहलें छात्रों के भीतर तर्कशीलता, संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक चेतना को जीवित रखने का कार्य करती हैं।
अध्ययन चक्र के माध्यम से यह संदेश उभरकर सामने आया कि लोकतांत्रिक शिक्षा कोई ऊपर से दी गई सुविधा नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है, जिसे अभ्यास, संवाद और संघर्ष के जरिए नीचे से निर्मित करना पड़ता है। संवाद ने इस आयोजन के जरिए इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।



