तेल व्यापार ठप, टूटे संबंध और तबाही का मंजर… ईरान-इजरायल जंग में कैसे फंस गए खाड़ी देश?

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग ने पूरे मिडिल ईस्ट को अपनी चपेट में ले लिया है। ईरान ने इजरायली हमले के बाद कतर के एलएनजी केंद्र और सऊदी की अरामको रिफाइनरी को निशाना बनाया।
HighLights
- ईरान ने कतर के एलएनजी केंद्र, सऊदी रिफाइनरी को निशाना बनाया
- युद्ध से कच्चे तेल की कीमतें $60 से $100 प्रति बैरल पहुंचीं
- खाड़ी देश अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच फंसे
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रही जंग अब पूरे मिडिल ईस्ट को अपनी चपेट में ले चुकी है। बुधवार रात ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर इजरायली हमले के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई तेज कर दी है।
इस क्रम में गुरुवार को ईरान ने कतर के रास लाफान इंडस्ट्रियल सिटी पर मिसाइल हमला किया, जहां दुनिया का सबसे बड़ा लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) उत्पादन केंद्र है। इसके बाद कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान ने सऊदी की सबसे बड़ी तेल कंपनी ‘अरामको’ की SAMREF रिफाइनरी को भी निशाना बनाया है।
यह हमला खाड़ी देशों पर ईरान के चरणबद्ध हमलों का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के ऊर्जा ठिकानों को भी निशाना बनाया गया है। संयुक्त अरब अमीरात पर भी ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइल हमले किए। ये युद्ध जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है खाड़ी देशों के लिए स्थिति जटिल होती जा रही है।

जंग की शुरुआत
28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई। इस घटना के बाद ईरान ने तीव्र जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी।
ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमलों से इजरायली, अमेरिकी सैन्य ठिकानों और खाड़ी देशों के ऊर्जा और रणनीतिक ढांचे को निशाना बनान शुरू किया।
इन हमलों में बहरीन, कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देश प्रभावित हुए हैं। अमेरिकी बेस और क्षेत्रीय बुनियादी ढांचे पर हमले बढ़ गए हैं, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता गहरा गई है।
खाड़ी देशों की चुनौतियां
फारस की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां बढ़ने और युद्ध के बादल छाने के बीच खाड़ी देशों के नेता कूटनीति से संघर्ष रोकने की कोशिश कर रहे थे।
लेकिन, अब सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, कुवैत और कतर खुद इस युद्ध की चपेट में आ गए हैं। ये देश, जो अमेरिका के सहयोगी हैं, ईरानी हमलों से सीधे प्रभावित हो रहे हैं।
तेल कीमतों पर प्रभाव
युद्ध की वजह से कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। युद्ध से पहले कीमतें लगभग 60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं, जो अब 90-100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई हैं। बुधवार को कीमतों में 5 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
तेल-गैस संसाधनों से समृद्ध इन खाड़ी देशों के पास अब विकल्प बहुत कम बचे हैं। वे युद्ध से बचने के लिए कूटनीति पर निर्भर हैं, लेकिन स्थिति तेजी से बिगड़ रही है। यह संघर्ष मिडिल ईस्ट की स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बन गया है।
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खाड़ी देशों का भविष्य
मौजूदा समय में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि खाड़ी देश अब आगे क्या करेंगे?
मिडिल ईस्ट की जंग शुरू होने से पहले तक कतर और ईरान में दोस्ताना संबंध थे। दोनों देश दुनिया के सबसे बड़े गैस उत्पादन क्षेत्र साउथ पार्स/नॉर्थ फील्ड को मिलकर चला रहे थे।
यह क्षेत्र कतर की समृद्धि का मुख्य आधार था। युद्ध शुरू होने से पहले कतर ने इसे रोकने के प्रयास भी किए थे।
इस युद्ध ने खाड़ी देशों और ईरान के बीच बने भरोसे को पूरी तरह खत्म कर दिया है। पार्स गैस फील्ड अब आग की लपटों में घिरा हुआ है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा पर गहरा संकट मंडरा रहा है।

खाड़ी देशों की दुविधा
भारी हमलों के बावजूद खाड़ी देशों ने अभी तक अमेरिका-इजरायल की आक्रामक कार्रवाइयों में औपचारिक रूप से शामिल नहीं हुए हैं। वे एक नाजुक मोड़ पर खड़े हैं। जहां एक तरफ वे अमेरिका और इजरायल के साथ संबंध बनाए रखना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ ईरान से सीधे टकराव से बचना चाहते हैं।
अरब देश न तो अमेरिका-इजरायल की खुली आलोचना कर रहे हैं और न ही ईरान का समर्थन, लेकिन अब उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। आगे हालात उनके लिए और भी जटिल होते जाएंगे।



