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**किसान आंदोलन: दिल्ली की सरहद पर फिर से बढ़ी किसानों की संख्या**
नई दिल्ली: राजधानी की सीमाओं पर एक बार फिर से किसानों की संख्या में इजाफा देखने को मिला है। विभिन्न राज्यों से आए अन्नदाता, सरकार की नीतियों के खिलाफ अपनी आवाज उठाने के लिए जमा हो रहे हैं। यह आंदोलन पिछले साल की तरह ही कृषि कानूनों के खिलाफ है, जिसे किसान हितैषी उपायों के रूप में प्रचारित किया गया था, लेकिन किसानों ने इसे अपने लिए हानिकारक बताया।
किसान संगठनों के नेताओं ने रविवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उनकी मांगें अब भी वही हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से स्पष्ट संकेत दिया है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक वे धरने से पीछे नहीं हटेंगे। किसान नेताओं ने यह भी कहा कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का पूरा हक है, और वे किसी भी प्रकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ खड़े रहेंगे।
इस आंदोलन के पीछे की कहानी गहरी है। पिछले साल जब तीन कृषि कानूनों को वापस लिया गया था, तब किसानों को कुछ राहत मिली थी। लेकिन अब फिर से उनकी समस्याएं सामने आ रही हैं। कुछ किसान संगठन अब भी यह महसूस करते हैं कि सरकार ने उनके साथ किए गए वादों को पूरा नहीं किया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि किसानों की स्थिति को समझने के लिए हमें उनकी जमीन पर जाकर देखना चाहिए। गांवों में, कई किसान आर्थिक तंगी के कारण परेशान हैं और उनके पास अपनी फसल को उचित दाम पर बेचने का कोई रास्ता नहीं है। कई छोटे किसान तो अपने कर्ज में डूबे हुए हैं और उन्हें कोई सहारा नहीं मिल रहा है।
किसान आंदोलन में शामिल होने वाले लोगों में युवा और बुजुर्ग दोनों शामिल हैं। एक युवा किसान ने कहा, “हमारी पीढ़ी का भविष्य इस आंदोलन से जुड़ा है। अगर हम आज अपनी आवाज नहीं उठाएंगे, तो कल हमें इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।”
सरकार ने अभी तक इस आंदोलन पर कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन पिछले साल की घटनाओं को देखते हुए, यह स्पष्ट है कि इस बार किसान अधिक संगठित और दृढ़ संकल्पित हैं। वे जानते हैं कि उनकी एकता ही उनकी ताकत है, और वे इसे साबित करने के लिए तैयार हैं।
इस बीच, स्थानीय प्रशासन ने सुरक्षा के इंतजाम किए हैं और धरना स्थलों के आसपास सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी है। यह देखना होगा कि यह आंदोलन किस दिशा में आगे बढ़ता है और सरकार किस प्रकार की प्रतिक्रिया देती है। किसानों की यह लड़ाई न केवल उनके अधिकारों के लिए है, बल्कि यह भविष्य में कृषि नीति को भी प्रभावित कर सकती है।



