स्वास्थ्य

ओडिशा के आदिवासी किशोरों में परिवार के नियंत्रण के बिना बिना धुएं वाला तम्बाकू सेवन: अध्ययन में हुई खोज

भुवनेश्वर, ओडिशा। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के ओडिशा अध्याय द्वारा किए गए एक नए अध्ययन से पता चला है कि आदिवासी समुदायों में बिना धुएं वाला तम्बाकू (स्मोकलेस टोपैको) का सेवन बड़े पैमाने पर हो रहा है। इस अध्ययन के अनुसार, आदिवासी पुरुषों में तम्बाकू सेवन की दर 61 प्रतिशत है, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 35 प्रतिशत दर्ज किया गया है।

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि अधिकांश आदिवासी किशोर और युवा इस खतरनाक आदत की शुरुआत बिना किसी पारिवारिक नियंत्रण या समझ के करते हैं। विशेषज्ञों ने इस प्रवृत्ति को स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बताते हुए जागरूकता अभियानों की सख्त जरूरत बताई है।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के ओडिशा शाखा के अधिकारी डॉ. अजय कुमार ने बताया, “हमने पाया है कि आदिवासी क्षेत्रों में बिना धुएं वाले तम्बाकू का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। खासकर युवा वर्ग में यह एक सामाजिक समस्या बनती जा रही है क्योंकि यह न केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर असर डालता है, बल्कि इसकी आदत का असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।”

विशेषज्ञों के अनुसार, बिना धुएं वाले तम्बाकू जैसे गुड़ाकुआ, खैनी और गुटखा हेतु इस्तेमाल किए जाते हैं, जो कैंसर, मुंह की और दांतों की समस्याओं के अलावा सांस लेने की समस्याएं भी उत्पन्न करते हैं। आदिवासी समुदायों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और जागरूकता की कमी के कारण इस समस्या का समाधान करना चुनौतीपूर्ण हो रहा है।

स्वास्थ्य विभाग द्वारा स्थानीय भाषा में शैक्षिक कार्यक्रम चलाने के प्रयास शुरू किए गए हैं, ताकि तम्बाकू के हानिकारक प्रभावों की जानकारी व्यापक स्तर पर पहुँचाई जा सके। इसके साथ ही परिवारों को भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी, ताकि वे अपने बच्चों को इस बुरी आदत से बचा सकें।

विश्लेषकों ने इसके लिए पारंपरिक नेतृत्व और समुदाय के बुजुर्गों को भी शामिल किए जाने की सलाह दी है, ताकि सामाजिक संरचना के माध्यम से इस समस्या पर प्रभावी नियंत्रण हो सके। स्थानीय स्वयंसेवक भी इस मुहिम का हिस्सा बनने लगे हैं जिससे जागरूकता बढ़ रही है।

इस अध्ययन के निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए, सरकार और गैर-सरकारी संगठन मिलकर आदिवासी इलाकों में स्मोकलेस तम्बाकू के सेवन को कम करने के लिए नीतियां बनाने और लागू करने की दिशा में काम कर रहे हैं। यह पहल आदिवासी युवाओं और महिलाओं के स्वास्थ्य संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक मानी जा रही है।

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!