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स्त्री रोग विशेषज्ञ ने बताया क्यों 45 के बाद महिलाओं में तेजी से बढ़ता है लिवर फैट: ‘इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है…’

नई दिल्ली, भारत

मेनोपॉज के बाद महिलाओं में मेटाबोलिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है, जिनमें फैटी लिवर एक प्रमुख विकार है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस अवस्था में महिलाओं का शरीर इंसुलिन रेजिस्टेंस के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है, जिससे लिवर में वसा जमने का खतरा तेजी से बढ़ जाता है।

डॉ. सीमा वर्मा, एक अनुभवी एन्डोक्रिनोलॉजिस्ट, ने बताया कि जैसे-जैसे महिलाएं 45 वर्ष की आयु पार करती हैं और मेनोपॉज के चरण में पहुंचती हैं, उनके हार्मोनल स्तरों में भारी बदलाव आते हैं। इस बदलाव के कारण शरीर में इंसुलिन का असर कम हो जाता है, जिसे इंसुलिन रेजिस्टेंस कहा जाता है। यह स्थिति लिवर में लिपिड्स के संचय को बढ़ावा देती है, जिससे फैटी लिवर की समस्या उत्पन्न होती है।

फैटी लिवर, जिसे गैर-अल्कोहलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) भी कहा जाता है, लिवर की कोशिकाओं में अतिरिक्त वसा जमा हो जाने से होता है। यह स्थिति धीरे-धीरे लिवर की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती है और गंभीर मामलों में सिरोसिस या लिवर फेल्योर का कारण बन सकती है।

विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि मेनोपॉज की उम्र पार करने वाली महिलाओं को अपने आहार और जीवनशैली पर विशेष ध्यान देना चाहिए। संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, तनाव प्रबंधन और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच से इस समस्या की शुरुआत को रोका जा सकता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में लगभग 30-40% महिलाओं को मेनोपॉज के बाद मेटाबोलिक सिंड्रोम और संबंधित बीमारियों का खतरा रहता है। इसलिए जागरूकता बढ़ाना और चिकित्सीय परामर्श आवश्यक माना जाता है।

डॉ. वर्मा ने कहा, “मेनोपॉज केवल जीवन का एक पड़ाव नहीं बल्कि शरीर में कई बदलावों का परिचायक है। महिलाओं को चाहिए कि वे इस दौर में अपनी सेहत का विशेष ध्यान रखें और लिवर स्वास्थ्य के लिए नियमित जांच कराएं।”

आखिरकार, शरीर की गति को समझते हुए उचित जीवनशैली अपनानी महिलाओं के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित कर सकती है और मेटाबोलिक बीमारियों के खतरे को कम कर सकती है।

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