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संस्थायी सदस्यता का विस्तार और वीटो का महत्व: भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सुधार पर खास राय

नई दिल्ली, दिल्ली

भारत ने यह स्पष्ट किया है कि उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता पाने का पूरा अधिकार प्राप्त है। इस प्रतिष्ठित वैश्विक मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए भारत ने बार-बार अपनी दावेदारी को मजबूती से पेश किया है, और हाल ही में भी इस विषय पर अपनी संकल्पना दोहराई है।

भारत का तर्क है कि एक आधुनिक और प्रभावशाली UNSC के लिए सदस्यता के विस्तार की जरूरत है, जो वैश्विक सुरक्षा चुनौतियों के उत्तरदायित्वों को बेहतर ढंग से संभाल सके। कोविड-19 महामारी, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आतंकवाद जैसी समस्याएं वर्तमान सुरक्षा प्रासंगिकता को दर्शाती हैं। इन सभी मुद्दों के समाधान के लिए एक समावेशी और प्रतिनिधि परिषद आवश्यक है।

भारत के अनुसार, केवल विस्तार ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि वीटो अधिकार का भी सही उपयोग और कूटनीतिक समझ आवश्यक है। वीटो अधिकार को केवल निरंतर विग्रह की बजाय संयम और जवाबदेही के साथ प्रयोग करना चाहिए ताकि परिषद के फैसलों में विश्वसनीयता बनी रहे। भारत ने लगातार कहा है कि स्थायी सदस्य के रूप में उसकी भूमिका विश्व शांति-सहयोग के लिए निर्णायक होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की बढ़ती राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य ताकत UNSC की स्थायी सदस्यता के मुद्दे को और भी जरूरी बनाती है। इसके अलावा, भारत की बड़ी लोकतांत्रिक प्रणाली और शांतिपूर्ण विदेश नीति इसे एक समुचित और विश्वसनीय सदस्य बनाती है, जो सुरक्षा परिषद में वैश्विक हितों का संतुलन बनाए रख सकती है।

हालांकि इस मांग के सामने अभी भी कई राजनीतिक बाधाओं और परंपरागत विरोध हैं, जिनमें कुछ स्थायी सदस्यों का वीटो शामिल है। फिर भी भारत का यह स्पष्ट संदेश है कि वह वैश्विक शांति-व्यवस्था में बराबर का भागीदार बनने के लिए पूरी तरह तैयार है।

संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में बदलाव की यह प्रक्रिया लंबी और जटिल जरूर है, परन्तु भारत की सक्रिय भागीदारी और मजबूत पैरवी इसे विश्व स्तर पर स्वीकार्यता दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकते हैं।

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