राजस्थान की न्याय व्यवस्था पर बढ़ता भार, अदालतों में फैसले का लंबा इंतजार

राजस्थान के जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या 25.56 लाख तक पहुंच जाना न्याय प्रणाली के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह स्थिति दर्शाती है कि न्याय पाने की प्रक्रिया लगातार लंबी और जटिल होती जा रही है।
अपराध से जुड़े मामलों की भरमार
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, लंबित मामलों में लगभग 80 प्रतिशत आपराधिक हैं। इससे अदालतों का अधिकांश समय इन्हीं मामलों में खर्च हो जाता है, जिससे नागरिक मामलों की सुनवाई और अधिक धीमी हो जाती है।
जयपुर सबसे अधिक प्रभावित
राजधानी जयपुर में न्यायिक दबाव सबसे ज्यादा है। जयपुर मेट्रो कोर्ट-I और II में कुल 6.67 लाख से अधिक मामले लंबित हैं। इतनी बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा सीमित संसाधनों के साथ करना एक बड़ी चुनौती बन चुका है।
अन्य जिलों में भी हालात गंभीर
अलवर, जोधपुर, उदयपुर और कोटा जैसे जिलों में भी एक-एक लाख से अधिक मामले लंबित हैं। भिलवाड़ा में भी हजारों लोग वर्षों से न्याय का इंतजार कर रहे हैं।
नियुक्तियों को लेकर स्थिति
केंद्र सरकार ने बताया है कि निचली अदालतों में न्यायिक पदों की नियुक्ति राज्य सरकार और उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आती है। सुप्रीम कोर्ट की समय-सीमा संबंधी गाइडलाइंस के बावजूद कई पद रिक्त रहते हैं।
डिजिटल व्यवस्था का योगदान
ई-कोर्ट्स परियोजना, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और ई-फाइलिंग से कुछ मामलों का तेजी से निपटारा संभव हुआ है। वर्चुअल ट्रैफिक कोर्ट ने लाखों चालान मामलों का समाधान किया है।
निष्कर्ष
तकनीक से व्यवस्था को मजबूती मिली है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए न्यायिक संसाधनों और मानव शक्ति में वृद्धि आवश्यक है।
राजस्थान के जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या 25.56 लाख तक पहुंच जाना न्याय प्रणाली के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह स्थिति दर्शाती है कि न्याय पाने की प्रक्रिया लगातार लंबी और जटिल होती जा रही है।
अपराध से जुड़े मामलों की भरमार
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, लंबित मामलों में लगभग 80 प्रतिशत आपराधिक हैं। इससे अदालतों का अधिकांश समय इन्हीं मामलों में खर्च हो जाता है, जिससे नागरिक मामलों की सुनवाई और अधिक धीमी हो जाती है।
जयपुर सबसे अधिक प्रभावित
राजधानी जयपुर में न्यायिक दबाव सबसे ज्यादा है। जयपुर मेट्रो कोर्ट-I और II में कुल 6.67 लाख से अधिक मामले लंबित हैं। इतनी बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा सीमित संसाधनों के साथ करना एक बड़ी चुनौती बन चुका है।
अन्य जिलों में भी हालात गंभीर
अलवर, जोधपुर, उदयपुर और कोटा जैसे जिलों में भी एक-एक लाख से अधिक मामले लंबित हैं। भिलवाड़ा में भी हजारों लोग वर्षों से न्याय का इंतजार कर रहे हैं।
नियुक्तियों को लेकर स्थिति
केंद्र सरकार ने बताया है कि निचली अदालतों में न्यायिक पदों की नियुक्ति राज्य सरकार और उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आती है। सुप्रीम कोर्ट की समय-सीमा संबंधी गाइडलाइंस के बावजूद कई पद रिक्त रहते हैं।
डिजिटल व्यवस्था का योगदान
ई-कोर्ट्स परियोजना, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और ई-फाइलिंग से कुछ मामलों का तेजी से निपटारा संभव हुआ है। वर्चुअल ट्रैफिक कोर्ट ने लाखों चालान मामलों का समाधान किया है।
निष्कर्ष
तकनीक से व्यवस्था को मजबूती मिली है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए न्यायिक संसाधनों और मानव शक्ति में वृद्धि आवश्यक है।



