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सरकार की मंशा साफ है कि आम उपयोगक्ताओं और छोटे व्यापारियों के लिए अभी भी यूपीआई मुफ्त ही रहेगा।

सरकार ने यूपीआई भुगतान को उपयोगकर्ताओं और छोटे व्यापारियों के लिए मुफ्त रखने का फैसला किया है। बैंकों और फिनटेक कंपनियों की शुल्क लगाने की मांग को वित्त मंत्रालय ने खारिज कर दिया है। आम बजट 2026-27 में यूपीआई और रूपे डेबिट कार्ड लेनदेन के लिए 2,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी की व्यवस्था की गई है। इससे डिजिटल भुगतान को बढ़ावा मिलेगा और लागत का बोझ कम होगा, हालांकि कंपनियों में निराशा है।

पिछले एक वर्ष से यूपीआई भुगतान (UPI Payment) में लागत का मुद्दा उठाकर देश के बैंक और भुगतान की सुविधा देने वाली कंपनियां (पेटीएम, फोनपे आदि) की तरफ से यूपीआई के जरिये होने वाले भुगतान पर शुल्क लगाने की मांग को वित्त मंत्रालय ने एक तरह से सिरे से खारिज कर दिया है।

सरकार की मंशा साफ है कि आम उपयोगक्ताओं और छोटे व्यापारियों के लिए अभी भी यूपीआई मुफ्त ही रहेगा। इस मंशा से ही आम बजट 2026-27 में यूपीआई और रूपे डेबिट कार्ड लेनदेन के लिए 2,000 करोड़ रुपए की सब्सिडी की व्यवस्था की है ताकि मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) माडल जारी रहे।

एमडीआर के तहत सरकार डिजिटल भगुतान को लेकर बैंकों के वित्तीय बोझ के बड़े हिस्से की भरपाई करती है। पिछले बजट में इस मद में 437 करोड़ रुपए का प्रविधान किया गया था, लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर 2,196 करोड़ रुपये कर दिया गया है। साथ ही सरकार ने यूपीआई के जरिये होने वाले बड़ी राशि के भुगतान पर अतिरिक्त शुल्क लगाने के प्रस्ताव को भी फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

वैसे सरकार के इस रुख से डिजिटल भुगतान को सफल बनाने में असली भूमिका निभा रहे बैंकों और पेमेंट गेटवे की भूमिका निभाने वाली फिनटेक कंपनियों में निराशा है। यूपीआई अभी रोजाना 30 करोड़ से अधिक ट्रांजेक्शन प्रोसेस कर रहा है और यह राशि स्केलिंग, फ्रॉड रोकथाम तथा इन्फ्रास्ट्रक्चर विस्तार के लिए अपर्याप्त मानी जा रही है।

बैंकों व फिनटेक कंपनियों का कहना है कि उन्हें हर एक डिजिटल भुगतान पर औसतन दो रुपए की लागत आती है और मौजूदा व्यवस्था में इसकी भरपाई नहीं हो रही। दूसरी तरफ, डिजिटल भुगतान के लिए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार करने, बढ़ती धोखाधड़ी की रोकथाम के लिए, नए फीचर्स जोड़ने में और दूरदराज के क्षेत्रों में इस सुविधा का विस्तार देने में उनकी लागत बढ़ती जा रही है।

आरबीआई (RBI) का डाटा बताता है कि 86 प्रतिशत लेनदेन 500 रुपए से कम राशि की होते हैं और यह लागत को बढ़ाता है।

बड़े व्यापारियों को शुल्क के दायरे में लाने की थी मांग

संबंधित कंपनियों के संगठन पेमेंट्स काउंसिल आफ इंडिया की तरफ से बड़े व्यापारियों (टर्नओवर 10 करोड़ से अधिक) पर एक शुल्क लगाने की मांग की जा रही थी। इस बारे में इनकी आरबीआई की तरफ से गठित समिति के समक्ष प्रस्तुतीकरण भी दिया गया था। डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले बड़े व्यापारियों से 0.2-0.3 प्रतिशत की दर से अतिरिक्त शुल्क लगाने की मांग की गई थी।

इन्होंने यह भी कहा था कि छोटे भुगतान और व्यक्तिगत तौर पर होने वाले लेन-देन पर शुल्क मुक्त बनाए रखने की बात कही थी। मौजूदा व्यवस्था को ज्यादा दिनों तक चलाने में असमर्थता की बात भी कही गई थी। हालांकि सरकार ने यूजर पर कोई शुल्क नहीं लगाने का स्पष्ट संकेत दे दिया है। वित्त मंत्रालय और आरबीआइ के अधिकारियों का कहना है यूपीआइ शुल्क बढ़ाने को लेकर अगर जरूरी होगा तो कुछ महीने बाद फिर से विमर्श किया जाएगा।

जनवरी में यूपीआई से रिकार्ड 2,170 करोड़ लेनदेन हुए

भारत में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) की लोकप्रियता और ट्रांजेक्शन की रफ्तार रिकार्ड स्तर पर पहुंच गई है और इसमें और तेजी के पूरे आसार हैं। जनवरी 2026 में यूपीआई ने रिकार्ड 2,170 करोड़ लेन-देन दर्ज किए, जिनका कुल मूल्य 28.33 लाख करोड़ रुपये रहा। यह दिसंबर 2025 के 2163 करोड़ ट्रांजेक्शन और 27.97 लाख करोड़ रुपये मूल्य से थोड़ा अधिक है। इस तरह से औसतन 70 करोड़ वित्तीय लेन-देन (91,403 करोड़ रुपए) रोजाना हो रहे हैं।

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