प्राइवेट अस्पतालों के चार्ज और दवाओं के मार्जिन पर नियंत्रण की मांग

जन स्वास्थ्य अभियान (JSA) और दवाओं एवं उपचार तक पहुंच पर कार्य समूह ने प्राइवेट अस्पतालों के चार्ज और दवाओं, मेडिकल उपकरणों तथा अन्य सामग्री के व्यापारिक मार्जिन पर नियंत्रण की मांग की है। यह मांग सुप्रीम कोर्ट द्वारा अस्पताल फार्मेसियों में दाम निर्धारण की जांच के बीच आई है।
प्राइवेट अस्पतालों के चार्ज का मुद्दा
समूहों ने सोमवार को जारी बयान में कहा कि मरीजों को इलाज, दवाओं और उपभोग्य सामग्री के लिए उच्च और मनमाने चार्ज का सामना करना पड़ता है, जबकि बिलों के खिलाफ चुनौती देने के सीमित विकल्प उपलब्ध हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अस्पताल फार्मेसियों द्वारा दवाओं पर लगाए जाने वाले भारी मुनाफे और मरीजों को बाध्य करने वाली प्रथाओं पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने सरकार से व्यापारिक मार्जिन के नियमों की समीक्षा करने को कहा है।
JSA के सह-संयोजक अभय शुक्ला ने बताया कि समस्या केवल दवाओं की कीमत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समग्र रूप से निजी अस्पतालों द्वारा उपचार, सेवाओं और सामग्री के लिए लगाए गए शुल्क से जुड़ी है। भारत में निजी स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार तो हुआ है, लेकिन उसके नियमन में काफी कमी है। मरीजों की अस्पतालों में बातचीत की क्षमता भी सीमित होती है।
2010 का क्लिनिकल एस्थेब्लिशमेंट (पंजीकरण और नियमन) अधिनियम स्वास्थ्य संस्थानों के पंजीकरण और सेवा, शुल्क की मानकीकरण के लिए रूपरेखा देता है, लेकिन इसकी कार्यवाही पूरे देश में समान नहीं है। कई राज्यों के अपने कानून और नियामक प्रावधान हैं।
मरीजों के लिए राहत और नियमन की जरूरत
समूहों ने बताया कि अस्पताल शुल्क के नियमन के अभाव में मरीजों को खासकर लंबी इलाज अवधि और कई दवाओं, उपकरणों से जुड़े खर्चे का भारी बोझ उठाना पड़ता है। वे केंद्र और राज्यों से प्राइवेट अस्पतालों की चार्जिंग पर सीमा निर्धारित करने और अत्यधिक बिलों के खिलाफ शीघ्र और सुलभ अपील प्रणाली स्थापित करने का आग्रह कर रहे हैं।
वे दवाओं, मेडिकल उपकरणों और सामग्री के व्यापारिक मार्जिन को भी नियंत्रित करने की मांग कर रहे हैं। दवाओं और उपचार तक पहुंच कार्य समूह के सह-संयोजक के.एम. गोपाकुमार ने कहा कि अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) मरीजों से कई गुना अधिक शुल्क लेने की अनुमति नहीं हो सकता।
समूह ने प्रतियोगिता आयोग ऑफ इंडिया (CCI) द्वारा पहले से जताई गई फर्मों के मार्जिन एवं अस्पतालों द्वारा चिकित्सा उत्पादों के नियंत्रण से उत्पन्न लाभ संबंधी चिंताओं को भी रेखांकित किया है। साथ ही, वित्तीय प्रोत्साहन के कारण चिकित्सीय फैसलों पर असर पड़ने की भी चिंता जताई गई है।
गेयेत्री शर्मा, सामुदायिक स्वास्थ्य चिकित्सक और शोधकर्ता ने कहा कि लाभ आधारित प्रोत्साहन डॉक्टरों को जरूरी से अधिक जांच या उपचार कराने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) से इस तरह के प्रोत्साहन सम्बन्धी नियमों की जांच करने का आग्रह किया है। इन समूहों ने एक मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की भी आवश्यकता जताई है, जिसमें निजी सेवादाताओं के नियमन के साथ-साथ सरकारी अस्पतालों को सशक्त बनाकर आसान सेवा उपलब्ध कराई जा सके।




