हेगसेथ ने माइग्रेशन को लेकर यूरोप पर BEACH ‘इनवेज़न’ D-Day भाषण में साधा निशाना

नॉरमान्डी, फ्रांस – अमेरिकी रक्षा सचिव ने नॉरमान्डी में D-Day के 82 वर्ष पूरे होने पर आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए यूरोप में बढ़ती माइग्रेशन समस्या को लेकर तीखी टिप्पणी की। यह वही नॉरमान्डी है जहाँ द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों ने नाजी कब्जे वाले उत्तर-पश्चिमी यूरोप को मुक्त कराने के लिए एक ऐतिहासिक ऑपरेशन शुरू किया था।
उन्होंने अपने भाषण में माइग्रेशन को ‘बीच पर हुई एक प्रकार की इनवेज़न’ करार दिया और इसे यूरोपीय देशों के लिए एक बड़ी चुनौती बताया। उनका कहना था कि यूरोप को न केवल इतिहास के उस बहादुरी भरे दौर को याद रखना चाहिए, बल्कि वर्तमान में हो रही इस नई समस्या से निपटने के लिए ठोस नीति बनानी होगी।
अमेरिकी रक्षा सचिव ने यह भी उल्लेख किया कि उस समय के ऑपरेशन D-Day की योजना, साहस और एकजुटता का प्रतीक था, जिससे आज के नेताओं को प्रेरणा लेनी चाहिए। उन्होंने कहा, “हम सभी को इस बात को समझना होगा कि स्वतंत्रता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है और माइग्रेशन के मामले में भी हमें इसी तरह सावधानी बरतनी होगी।”
उनके इस बयान का यूरोप के कुछ नेताओं और मानवाधिकार संगठनों ने विरोध भी किया है। उनका कहना है कि माइग्रेशन के मुद्दे को केवल सुरक्षा या खतरों के नजरिए से देखना उचित नहीं है, बल्कि इसे मानवीय करुणा और वैश्विक सहयोग के नजरिए से समझने की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह बयान वर्तमान राजनीति और यूरोपीय सीमा नियंत्रण नीतियों के बीच बढ़ते तनाव का परिणाम हो सकता है, जहां कुछ देशों ने अप्रवासन को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। फ्रांस, जर्मनी और अन्य कई देशों में माइग्रेशन को लेकर जनता और सरकार की राय में भारी मतभेद देखे गए हैं।
82 वर्षों बाद भी D-Day के ऐतिहासिक महत्व को याद करते हुए, यह भाषण नई चुनौतियों और वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में सुरक्षा और स्वतंत्रता की लड़ाई को कैसे परिभाषित किया जाना चाहिए, इस पर एक गहरा प्रभाव छोड़ने वाला प्रतीत होता है।
इस अवसर पर विभिन्न देशों के प्रतिनिधि, सैनिकों के वंशज और इतिहासकार भी मौजूद थे, जिन्होंने मूर्तिभाव से उस महान दिन का स्मरण किया और एकजुटता का संदेश दिया।
अमेरिकी रक्षा सचिव का यह बयान आगामी दिनों में माइग्रेशन नीति संबंधित अंतरराष्ट्रीय चर्चाओं को प्रभावित कर सकता है और विश्व नेतृत्व को इस विषय पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर सकता है।


