मद्रास हाई कोर्ट ने 6 AIADMK विधायकों के इस्तीफे को मंजूर करने का स्पीकर का निर्णय बरकरार रखा

मद्रास उच्च न्यायालय ने इस सप्ताह तमिलनाडु विधानसभा के स्पीकर के उस फैसले को बरकरार रखा जिसमें छह AIADMK विधायकों के इस्तीफे को स्वीकार किया गया, जो बाद में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की पार्टी TVK में शामिल हो गए। कोर्ट ने कहा कि महाभियोग की लंबित कार्रवाइयां विधायकों के इस्तीफा देने में बाधा नहीं हैं।
स्पीकर के निर्णय पर अदालत की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश सुष्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की डिविजन बेंच ने स्पीकर से कहा है कि वे अंतर्गत चल रहे महाभियोग की सुनवाई दो महीने के अंदर पूरी करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस्तीफे का मतलब यह नहीं कि महाभियोग की सुनवाई रद्द हो गयी। बेंच ने सात दिन में सुनवाई का समयबद्ध कार्यक्रम तैयार करने को भी कहा और विधायकों को अनावश्यक स्थगन से रोका।
यह फैसला AIADMK के आधिकारिक व्हिप एग्री एसएस कृष्णमूर्ति और देशीय मक्खल शक्ति पार्टी अध्यक्ष एम.एल. रवि द्वारा दायर याचिकाओं पर आया था। ये याचिकाएं इस्तीफे की स्वीकृति को चुनौती देते हुए महाभियोग पर कार्रवाई की मांग कर रही थीं।
विधायकों के इस्तीफे और पार्टी का विभाजन
23 अप्रैल को हुई विधानसभा चुनावों के बाद कोई भी पार्टी पूर्ण बहुमत नहीं हासिल कर सकी। TVK ने 108 सीटें पाने के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर सरकार बनाने का अवसर पाया, जबकि DMK को 59 और AIADMK को 47 सीटें मिलीं।
विजय को 13 मई तक बहुमत साबित करने के निर्देश दिए गए। AIADMK ने सभी विधायकों को विपक्ष में वोट देने का निर्देश दिया, लेकिन 25 विधायकों ने पार्टी व्हिप को नजरअंदाज करते हुए समर्थन किया। इसके बाद AIADMK ने दसवें अनुसूची के तहत महाभियोग कार्रवाई शुरू की।
इन 25 विधायकों में से छह ने इस्तीफा दिया और TVK में शामिल हो गए। ये S. जयकुमार, मरगथम कुमारवेल, पी. सथ्यभामा, डॉ. एसाक्की सुबया, डॉ. सी. विजय भास्कर और एम.आर. विजय भास्कर हैं। पहले तीन ने 25 मई को इस्तीफा दिया, जबकि अन्य ने 26 मई, 16 और 29 जून को क्रमशः इस्तीफा दिया।
AIADMK ने स्पीकर के इस्तीफे स्वीकारने के फैसले को चुनौती दी, यह कहते हुए कि पहले महाभियोग मामलों का निपटारा होना चाहिए था। पार्टी ने यह भी आरोप लगाया कि तेजी से इस्तीफे स्वीकार करने का उद्देश्य विधायकों को दंड से बचाना था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस्तीफा और महाभियोग अलग-अलग संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत आते हैं। स्पीकर इस्तीफे की गंभीरता और स्वैच्छिकता जांचता है, लेकिन राजनीतिक कारणों की गहराई में नहीं जाता। अदालत ने पाया कि विधायकों के इस्तीफे स्वैच्छिक और वास्तविक थे।
न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि यदि इस्तीफा वास्तविक नहीं होता है तब स्पीकर उसे अस्वीकार कर सकते हैं, लेकिन बाहरी कारणों को ध्यान में नहीं रखा जा सकता। इस फैसले के साथ कोर्ट ने इस्तीफे को वैध माना, लेकिन महाभियोग की सुनवाई पूरी करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कोर्ट ने कहा कि लंबित महाभियोग मामलों से मतदाताओं के प्रति विधानसभा की विश्वसनीयता प्रभावित होती है, इसलिए सुनवाई त्वरित होनी चाहिए। स्पीकर को सात दिन में सुनवायी का टेबल बनाई करनी होगी और दो महीने के भीतर आरोपों पर निर्णय देना होगा।
अगर समय सीमा का उल्लंघन हुआ तो पक्षकार हाईकोर्ट में पुनः अपील कर सकते हैं। यह आदेश इस्तीफों को बरकरार रखते हुए महाभियोग की प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए बाध्य करता है। इससे विधायकों को न तो दोषमुक्ति मिली और न ही तत्काल पद से निष्कासन हुआ।




