जयपुर में ट्रैफिक पुलिसकर्मी रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार, पंक्चर वाले के QR कोड से लेता था पैसा।

जयपुर में भ्रष्टाचार का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जिसने कानून व्यवस्था और डिजिटल पेमेंट सिस्टम की विश्वसनीयता दोनों पर सवाल उठा दिए हैं। इस मामले में एक ट्रैफिक पुलिस कॉन्स्टेबल ने रिश्वत लेने के लिए नकद का सहारा नहीं लिया, बल्कि उसने एक पंक्चर बनाने वाले के क्यूआर कोड का इस्तेमाल करके लोगों से ऑनलाइन रिश्वत वसूलना शुरू कर दिया। यह तरीका इतना चालाक और सोचा-समझा था कि काफी समय तक किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी।
मामले की शुरुआत तब हुई, जब बजाज नगर थाना अधिकारी पूनम चौधरी को मुखबिर से सूचना मिली कि एक यातायात पुलिसकर्मी अवैध वसूली कर रहा है। सूचना में यह भी बताया गया कि वह सीधे पैसे नहीं लेता बल्कि लोगों को चालान से बचाने के बदले पंक्चर वाले के क्यूआर कोड पर पैसे ट्रांसफर करवाता है। इस सूचना के आधार पर पुलिस टीम ने निगरानी शुरू की और आरोपी को ट्रैप कर रंगे हाथों पकड़ लिया।
गिरफ्तार आरोपी की पहचान भवानी सिंह के रूप में हुई, जो जयपुर यातायात पुलिस में कॉन्स्टेबल के पद पर तैनात था। पुलिस की जांच से पता चला कि वह मोहम्मद मुस्ताक नाम के एक पंक्चर बनाने वाले के साथ मिलकर यह पूरा खेल चला रहा था। जब भी वह किसी वाहन चालक को रोकता, चालान काटने का डर दिखाकर कहता कि यदि चालान से बचना है, तो जुर्माने की राशि ऑनलाइन इस क्यूआर कोड पर भेज दो। यह क्यूआर कोड मुस्ताक के बैंक खाते से जुड़ा था।
इस तरह, भवानी सिंह खुद रिश्वत लेते हुए पकड़ा नहीं जा सकता था, क्योंकि पैसे उसके खाते में नहीं आते थे। वह अपनी पहचान छिपाकर तकनीक का इस्तेमाल करते हुए रिश्वत ले रहा था। इस मामले में ऑनलाइन भुगतान के रिकॉर्ड को देखकर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि रिश्वत की यह प्रणाली काफी समय से चल रही थी और इसमें अच्छी-खासी कमाई हो रही थी।
पुलिस ने जब दोनों से पूछताछ की, तो यह भी सामने आया कि भवानी सिंह पहले नकद में रिश्वत लेता था, लेकिन नकद लेने के डर से उसने डिजिटल तरीका अपनाया। उसने सोचा कि अगर पैसे किसी तीसरे व्यक्ति के खाते में जाएंगे, तो उस पर शक कम होगा। लेकिन उसकी यह योजना ज्यादा समय तक नहीं चली और आखिरकार वह कानून के जाल में फंस ही गया।
गिरफ्तारी के बाद दोनों आरोपियों को जयपुर जिला न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें तीन दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है। पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि क्या इस अवैध कमाई में और लोग भी शामिल थे? क्या मुस्ताक भी इस कमाई में हिस्सा लेता था? और कितने समय से यह भ्रष्टाचार का खेल चल रहा था?
इस मामले ने सोशल मीडिया और स्थानीय लोगों के बीच भी खूब चर्चा बटोरी। लोग पूछ रहे हैं कि जब पुलिसकर्मी ही डिजिटल रिश्वत लेने लगेंगे, तो आम आदमी किस पर भरोसा करे? यह घटना केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि डिजिटल पेमेंट सिस्टम के गलत इस्तेमाल का भी उदाहरण बन गई है।
यह पहली बार नहीं है जब जयपुर में पुलिस पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों, लेकिन इस मामले ने रिश्वत लेने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया। नकद की जगह अब क्यूआर कोड, यूपीआई और बैंक ट्रांसफर जैसे माध्यम रिश्वत लेने का नया जरिया बनते दिख रहे हैं।
इस घटना के बाद पुलिस विभाग ने कहा कि वह ऐसे मामलों पर सख्त निगरानी करेगा और भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए डिजिटल लेनदेन पर भी सुरक्षा प्रणाली मजबूत करेगा। विभाग ने आश्वासन दिया है कि दोषियों को सख्त सज़ा दी जाएगी ताकि भविष्य में कोई भी पुलिसकर्मी इस तरह के हाईटेक भ्रष्टाचार का रास्ता न अपनाए।
इस घटना ने यह साबित कर दिया कि तकनीक जितनी उपयोगी है, उतनी ही खतरनाक भी हो सकती है, अगर उसका इस्तेमाल गलत इरादों से किया जाए। कानून तोड़ने वालों के लिए यह नया तरीका चाहे कितना भी सुरक्षित क्यों न लगे, लेकिन अंत में कानून के हाथ लंबे होते हैं और सच्चाई सामने आ ही जाती है।



