धार्मिक

पहली छाप से परे: बौद्ध कथा में अंतर्निहित पूर्वाग्रह

एक युवा साधु जो अपने शुद्ध जन्म और अनुशासित जीवन पर गर्व करता था, एक बार बुद्ध के साथ नदी के किनारे बैठा था। तभी उसने एक निम्न जाति की महिला को पानी भरते देख अपनी जगह हटा ली और उसकी छाया को भी अपने ऊपर पड़ने से इनकार कर दिया।

पूर्वाग्रह और उसकी जड़ें

बुद्ध ने धीरे से पूछा, “साधु, नदी का पानी शुद्ध है या वह मटका जिसमें पानी भरा है?” साधु ने जवाब दिया, “पानी।” बुद्ध ने कहा, “तो फिर मटका क्यों आंकते हो और उस पानी को क्यों भूल जाते हो जो हम सबको भरता है?” इस प्रश्न ने साधु के गर्व को तोड़ दिया।

हम में से कई लोग भी उसी साधु की तरह पूर्वाग्रहों के कारण सही रूप से नहीं देख पाते हैं। हमारी मन की पहली प्रतिक्रिया बिना बोले किसी व्यक्ति, उनकी भाषा, नाम, त्वचा रंग आदि देखकर फैसला कर लेती है। इसे हम सहज ज्ञान यानि intuition कहते हैं, लेकिन यह अक्सर अधूरा और अवैज्ञानिक होता है।

सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव

पूर्वाग्रहों की जड़ें विकासवादी हैं, जब तत्काल निर्णय जीवन रक्षा के लिए जरूरी थे। पर आज के आधुनिक समाज में ये निर्णय गलत रूप में हमारे बीच दीवारें खड़ी कर देते हैं। उदाहरण के लिए, अंग्रेजी बोलने वाला व्यक्ति बुद्धिमान माना जाता है, वहीं गहरे रंग का व्यक्ति कम दर्जे का। यह जानबूझकर नहीं, बल्कि अनजाने में होता है।

व्यवहारिक अर्थशास्त्रियों ने “सुंदरता का प्रीमियम” नामक अवधारणा बताई है, जिसके अनुसार सुंदर व्यक्तियों को नौकरी में जल्दी मौका मिलता है, उन पर भरोसा अधिक होता है एवं वे जीवन में अधिक वेतन पाते हैं। यही नहीं, जाति, रंग, क्षेत्र, लिंग जैसे अचेतन फिल्टर हमारे फैसलों और कैरियर पर गहरा प्रभाव डालते हैं।

निष्पक्षता के बजाय, हमारा मन पुराने पैटर्न को पहचानने में व्यस्त रहता है। निर्णय वैज्ञानिक गैरी क्लेन के अनुसार, intuition पैटर्न रिकग्निशन है, जो उन विषयों पर भरोसेमंद होता है जिन्हें हमने वर्षों में समझा हो। पर नए सांस्कृतिक परिवेशों में यह गलतफहमी बन जाती है।

कई संगठन भाषाई प्रवाह को क्षमता से महत्वपूर्ण मानते हैं। लेखक सुसान केन कहती हैं कि शांत स्वभाव के लोग अधिक रचनात्मक होते हैं, लेकिन चुप रहने के कारण उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है जबकि जोर से बोलने वालों को नेतृत्व माना जाता है। यह व्यवस्था भी पूर्वाग्रह का ही रूप है।

1968 की रोसेंथल-जैकब्सन अध्ययन में पता चला कि जब शिक्षकों को बताया गया कि कुछ छात्र “खिलेंगे” तो वे सचमुच बेहतर प्रदर्शन करने लगे। यह दिखाता है कि अपेक्षाएँ न केवल प्रदर्शन बताती हैं, बल्कि उसे आकार भी देती हैं।

पूर्वाग्रह खत्म करना कठिन है क्योंकि यह बिना चेतना के काम करता है। लेकिन सहानुभूति से हम इसे पहचान कर उससे लड़ सकते हैं। बोलचाल में अपनी भाषा, भाव और व्यवहार को दूसरों की दृष्टि से परखना जरुरी है ताकि हम अपने अवचेतन भेदभाव का सामना कर सकें। यही कुछ ऐसा है जो समाज को जोड़ सकता है और उन सीमाओं को मिटा सकता है जो मन से बनी होती हैं।

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