केरल के सरकारी अस्पतालों में NCD इलाज की दवाओं की कमी

केरल के सरकारी अस्पतालों में गैर-संचारी रोगों (NCD) के इलाज के लिए आवश्यक दवाओं की कमी देखने को मिल रही है। खासकर मधुमेह, उच्च रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित करने वाली दवाओं का स्टॉक कम हो गया है। हालांकि अधिकारियों ने कहा है कि ये दवाएं एक सप्ताह के भीतर फिर से उपलब्ध हो जाएंगी।
अस्पतालों में दवाओं की कमी और स्थानीय खरीदारी
फैमिली हेल्थ सेंटर, तिरुवनंतपुरम के मेडिकल ऑफिसर ने बताया कि सभी दवाओं की कमी नहीं है, लेकिन NCD दवाएं नियमित रूप से ली जानी चाहिए। इसलिए इन दवाओं की आपूर्ति में रुकावट चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि इस कमी को पहले ही भांपा गया था और स्थानीय खरीद से मरीजों के इलाज में बाधा नहीं आने दी गई।
एक तालुक अस्पताल के अधीक्षक ने बताया कि जहां पर्याप्त फंड मौजूद हैं, वहां स्थानीय खरीद आसानी से हो रही है। ब्लॉक पंचायत भी दवाओं की खरीद के लिए पैसे देती है। लेकिन छोटे पंचायतों के अस्पतालों में वित्तीय तंगी के कारण दवाएं खरीद पाना मुश्किल हो सकता है।
NCD क्लीनिकों में दवाओं का स्टॉक
मतलब यह है कि NCD क्लीनिक में रजिस्टर मरीजों को उनकी नियमित दवाइयां कम से कम 30 दिनों के लिए उपलब्ध होनी चाहिए। वर्तमान में कई अस्पताल यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहे हैं।
मेडिकल ऑफिसरों ने बताया कि इस साल के पहले तिमाही में केरल मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (KMSCL) ने दवाओं की आपूर्ति की थी, जबकि जून में दूसरे तिमाही का वितरण नहीं हुआ जिससे दवाओं की कमी हुई।
KMSCL सालाना करीब ₹700-800 करोड़ की दवा खरीद करता है, जो लगभग 8,000 सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को वितरित होती है। हाल की खरीद प्रक्रिया में 180 दवाओं पर कोई बोली नहीं लगी और 171 दवाओं के लिए उच्च कीमतें मिलें, जिससे पुनः टेंडर देना पड़ा और आदेशों में देरी हुई।
सूत्रों के अनुसार, जनवरी से मार्च तक के टेंडर कैंसल हो गए क्योंकि नई सरकार ने दवाओं की कीमतें बहुत अधिक पाईं। हालांकि नई खरीद प्रक्रिया शुरू हो गई है और दवाएं एक सप्ताह के भीतर पहुंच जाएंगी।
इसके अलावा, KMSCL पर फार्मा कंपनियों का ₹2,200 करोड़ से अधिक बकाया है, जो दवाओं के भुगतान में देरी और फार्मा कंपनियों की भागीदारी कम होने का कारण बना है। स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन ने इस समस्या को देखते हुए नई वित्तीय वर्ष की खरीद प्रक्रिया अक्टूबर से शुरू करने और दिसंबर तक पूरी करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने टेंडर प्रक्रिया से दलालों को हटाने और आयातित दवाओं की कंपनियों को भी टेंडर में शामिल करने की बात कही है।
सरकार कई राज्यों की मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन के साथ मिलकर कॉन्सोर्टियम बनाने की कोशिश कर रही है ताकि एक साथ टेंडर जारी कर दवाओं की कीमतें कम की जा सकें। इससे दवाओं की उपलब्धता बेहतर होगी और कीमतों में स्थिरता आएगी।




