पति के अवैध संबंध को आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता : हाई कोर्ट

अवैध संबंध, आत्महत्या और कानून
हाई कोर्ट ने धारा 306 की सीमाएं स्पष्ट कीं
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने पति के कथित अवैध संबंधों से परेशान होकर पत्नी द्वारा आत्महत्या किए जाने के मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने निचली अदालत के निर्णय को बरकरार रखते हुए कहा कि केवल अवैध संबंध होना आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता। जब तक आत्महत्या के लिए सीधा, स्पष्ट और सक्रिय उकसावा साबित न हो, तब तक भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसी आधार पर मृतका के पति और उसकी महिला मित्र को दोषमुक्त कर दिया गया।
यह निर्णय उन मामलों में मार्गदर्शक माना जा रहा है, जहां वैवाहिक विवाद, नैतिक आरोप और आपराधिक जिम्मेदारी के बीच की रेखा को समझना जरूरी हो जाता है।
मामले की पृष्ठभूमि
शादी से तनाव तक का सफर
मामले के अनुसार कुंती की शादी वर्ष 2011 में रवि कुमार गायकवाड से हुई थी। शुरुआती वर्षों के बाद दांपत्य जीवन में मतभेद सामने आने लगे। कुंती के मायके पक्ष ने आरोप लगाया कि उसे संतान न होने, कम दहेज लाने और अशिक्षित होने को लेकर प्रताड़ित किया जाता था। इसके साथ ही पति पर एक महिला मित्र के साथ अवैध संबंध रखने का आरोप भी लगाया गया।
परिजनों का कहना था कि इन कारणों से कुंती मानसिक रूप से परेशान रहती थी और उसका वैवाहिक जीवन लगातार तनाव में था।
आत्महत्या की घटना
4 जून 2017 का दर्दनाक दिन
चार जून 2017 को कुंती ने आत्महत्या कर ली। इस घटना ने दोनों परिवारों को झकझोर दिया। आत्महत्या के बाद पति और उसकी कथित महिला मित्र के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने जांच शुरू की और परिजनों के बयान दर्ज किए।
हालांकि, जांच के दौरान कोई सुसाइड नोट सामने नहीं आया, न ही ऐसा कोई ठोस साक्ष्य मिला जिससे यह सीधे तौर पर साबित हो सके कि किसी विशेष कार्रवाई या दबाव के कारण कुंती ने आत्महत्या की।
अभियोजन पक्ष के आरोप
प्रताड़ना और अवैध संबंध का दावा
अभियोजन पक्ष ने अदालत में यह तर्क रखा कि पति के अवैध संबंध और घरेलू प्रताड़ना के कारण कुंती गहरे मानसिक तनाव में थी। इसी मानसिक दबाव ने उसे आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए मजबूर किया।
अभियोजन का यह भी कहना था कि प्रताड़ना केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक भी हो सकती है और लंबे समय तक चला तनाव आत्महत्या का कारण बन सकता है।
बचाव पक्ष की दलील
कानून में भावनाओं की नहीं, सबूतों की अहमियत
बचाव पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि आत्महत्या के लिए उकसावे का अपराध तभी बनता है, जब आरोपी की ओर से कोई प्रत्यक्ष, सक्रिय और तत्काल उकसाने वाला कृत्य साबित हो। केवल पारिवारिक विवाद, संदेह या नैतिक आरोप के आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।
बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि अभियोजन पक्ष कोई ऐसा प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे यह सिद्ध हो कि आरोपियों ने आत्महत्या के लिए उकसाया हो।
सत्र न्यायालय का निर्णय
2022 में दोनों आरोपी दोषमुक्त
मामले की सुनवाई महासमुंद सत्र न्यायालय में हुई। लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद 22 जुलाई 2022 को अदालत ने पति और उसकी महिला मित्र को दोषमुक्त कर दिया। सत्र न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष आत्महत्या के लिए उकसावे का आवश्यक तत्व साबित करने में असफल रहा है।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि संदेह या नैतिक आक्षेप के आधार पर किसी को आपराधिक अपराध का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
हाई कोर्ट में अपील
पीड़ित पक्ष की याचिका पर सुनवाई
सत्र न्यायालय के फैसले के खिलाफ पीड़ित पक्ष ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में अपील दायर की। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय श्याम अग्रवाल की सिंगल बेंच में हुई। पीड़ित पक्ष ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने तथ्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया और अवैध संबंधों के कारण उत्पन्न मानसिक प्रताड़ना को नजरअंदाज कर दिया।
वहीं राज्य और बचाव पक्ष ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।
हाई कोर्ट का फैसला
अवैध संबंध नैतिक रूप से गलत, पर कानूनी उकसावा नहीं
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अवैध संबंध सामाजिक और नैतिक दृष्टि से निंदनीय हो सकते हैं, लेकिन कानून की नजर में इन्हें तब तक आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता, जब तक कि उनका सीधा और स्पष्ट संबंध आत्महत्या से साबित न हो।
अदालत ने कहा कि धारा 306 के तहत दोष सिद्ध करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी की भूमिका ऐसी थी, जिसने मृतक को आत्महत्या के लिए मजबूर किया।
धारा 306 की व्याख्या
हर आत्महत्या में अपराध नहीं बनता
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आत्महत्या के हर मामले में धारा 306 अपने-आप लागू नहीं होती। कानून यह मांग करता है कि उकसावे का तत्व प्रत्यक्ष और प्रमाणित हो। भावनात्मक तनाव, घरेलू कलह या वैवाहिक विवाद अपने-आप में आपराधिक उकसावा नहीं माने जा सकते।
अदालत ने पूर्व के न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि नैतिक गलतियों और आपराधिक अपराधों के बीच स्पष्ट अंतर है।
सामाजिक बनाम कानूनी नजरिया
फैसले पर बहस की संभावना
यह फैसला कानूनी दृष्टि से मजबूत माना जा रहा है, लेकिन सामाजिक स्तर पर इस पर बहस भी संभव है। कई लोग मानते हैं कि अवैध संबंध और पारिवारिक तनाव मानसिक प्रताड़ना का कारण बन सकते हैं। वहीं अदालतों का रुख यह है कि आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए भावनाओं से अधिक सबूत जरूरी होते हैं।
निष्कर्ष
सबूत के बिना सजा नहीं
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि आपराधिक कानून प्रमाणों पर आधारित होता है, न कि केवल आरोपों या नैतिक धारणाओं पर। आत्महत्या जैसे गंभीर मामलों में भी दोष सिद्ध करने के लिए उकसावे का ठोस और प्रत्यक्ष प्रमाण आवश्यक है।



