राष्ट्रीय

‘कभी पुरुषों से भरी रहती थी क्लास…’, गौरी शर्मा त्रिपाठी ने सुनाई नानी से नातिन तक कथक साधना के बदलते दौर की कहानी

Women’s Day Special : एक ऐसी दुनिया जहां लोरी की जगह तबले की थाप सुनाई देती हो और खिलौनों की जगह पैरों में बंधे घुंघरू हों। यह कहानी किसी साधारण नृत्य की नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों की उस स्त्री-शक्ति की है, जिसने कथक की साधना को जीवित रखा। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर पढ़ें-  गुरु पद्मा शर्मा से गौरी शर्मा त्रिपाठी और अब उनकी बेटी तारिणी तक प्रेरक ‘कथक’ गाथा

HighLights

  1. मां के पसीने की खुशबू से ‘ग्लोबल स्टेज’ तक की प्रेरक गाथा
  2. गौरी शर्मा त्रिपाठी ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कथक प्रस्तुत किया।
  3. गौरी शर्मा त्रिपाठी ने महाभारत में किया था उर्वशी का रोल।

दीप्ति मिश्रा, नई दिल्‍ली।
“यतो हस्तस्ततो दृष्टिः, यतो दृष्टिस्ततो मनः।
यतो मनस्ततो भावः, यतो भावस्ततो रसः॥”

जहां हाथ जाएं वहीं नजर जानी चाहिए और जहां नजर हो वहीं होना चाहिए मन…. भरतमुनि ने जब नाट्यशास्त्र रचा तो एक बेहद जरूरी श्लोक में उन्होंने यही अर्थ और भाव पिरोये। ‘यतो हस्तस्ततो दृष्टिः, यतो दृष्टिस्ततो मनः’ आज भी नर्तकों के लिए संविधान की तरह है। नृत्य की किसी भी विधा को प्रस्तुत करने वाले कलाकार मंच पर इसी एक भाव के सहारे अपनी प्रस्तुति दर्शकों के सामने रखते हैं।

नृत्य की विधा के साथ इस मंत्र को आत्मसात कर लेने वाली कई नृत्यांगनाएं ऐसी भी हैं, जिन्होंने भरतमुनि के श्लोक में शामिल हाथ और नजर की इस बात को सिर्फ अपने तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने इस भाव का प्रयोग दूसरी प्रतिभाओं को तैयार करने में भी किया है। फिर तो एक बार जो हाथ बढ़ाया तो हाथ से हाथ जुड़ते चले गए और कथक परंपरा की एक लंबी विरासत तैयार होती गई।

कहते हैं कि संगीत और नृत्य की विधा ईश्वर का वरदान होती है, लेकिन इसे निखारने का प्रयास साधक या साधिका को ही करना होता है। ये कहानी कथक के ऐसी ही साधक परंपरा की है, जहां एक परिवार तीन पीढ़ियों से लय-ताल का संगम और घुंघरुओं का रुनझुन संगीत न सिर्फ बिखेर रहा है, बल्कि नई साधिकाओं को तैयार कर रहा है।

कथक की इस साधिका को हम आज गौरी शर्मा त्रिपाठी के नाम से जानते हैं, जिनकी कहानी यूं तो वैसे भी एक प्रेरणा है, अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर और भी मौजूं हो जाती है।

नृत्‍य से पहली मुलाकात..

कहानी कुछ यूं शुरू होती है… जगमगाते तारों से भरी एक सर्द शाम और किसी पुरानी हवेली का जिंदादिल आंगन ही मंच था। अचानक बिजलियां सी कौंधती हैं और गंभीर कर देने वाली सुर लहरियों के बीच ‘अहम ब्रह्मास्मि’ का नाद गूंजता है।

इसी के साथ हाथों में दीपक संभाले हुए गौरी मंच पर प्रवेश करती हैं और उस वीराने में अध्यात्म की ऊर्जा भर देती हैं। कथक की गतिमान चालों और कई चक्करदार परन के थमने पर जब उनसे पूछा कि इस शास्त्रीय ऊर्जा का सोर्स क्या है?

गौरी बिना एक पल रुके-थमे जवाब देती हैं, ये सब मेरी मां की देन है। लंबी नृत्य प्रस्तुतियों के बाद जब वो पसीने से भीगे आंचल में मुझे गोद लेती रही होंगी तो मेरे हिस्से सिर्फ ममता ही नहीं आई उनका ज्ञान, उनकी नृत्य साधना भी आई। और मैं ये मानती हूं कि मंच पर मैं नहीं मेरे ही भीतर से मेरी मां ही निकल रही होती हैं।

Gauri

हर भाव और प्रवाह में मैं उनकी मौजूदगी पाती हूं और जब किसी नृत्य प्रस्तुति के बाद, तमाम तारीफों और तालियों के बाद उनसे मिलती हूं तो वह कहती हैं कि देख, मैं उस ताल टुकड़े पर कैसे भाव लाती या कैसी भंगिमाएं बनातीं तो जो मैं हूं वह असल में मेरी मां ही हैं।

इस पर गौरी की बेटी तारिणी जो इस नृत्य प्रस्तुति में साथ ही थीं, कहती हैं कि बिल्कुल, मां सही कह रही हैं। बल्कि आप मेरे भावों और भंगिमाओं में मां और नानी दोनों को देख सकते हैं। फिर निकलकर आता है इस परंपरा की धुरी का सबसे बड़ा नाम… कथक परंपरा की गुरु पद्मा शर्मा का, जो बेटी गौरी, नातिन तारिणी के साथ इस विरासत का अद्भुत उदाहरण हैं।

लखनऊ घराने की अमर विरासत

तीन पीढ़ियां, तीन समय, तीन दृष्टियां, लेकिन साधना एक ही, कथक। यह कहानी केवल तीन कलाकारों की उपलब्धियों की नहीं, बल्कि उस स्त्री परंपरा की है, जिसने भारतीय शास्त्रीय नृत्य को घर की चौखट से उठाकर विश्व मंच तक पहुंचाया।

लखनऊ घराने की प्रतिष्ठित कथक गुरु पद्मा शर्मा ने अपनी साधना और शिक्षण के जरिए दशकों तक इस कला को जीवित रखा। संगीत नाटक अकादमी के अमृत पुरस्कार से सम्मानित पद्मा शर्मा के लिए कथक केवल मंचीय कला नहीं, बल्कि जीवन का अनुशासन था। उनके घर में रियाज रोजमर्रा की एक प्रक्रिया थी।

 

Gauri and tarini

बेटी तारिणी त्रिपाठी के साथ एक परफॉर्मेस के दौरान गौरी शर्मा त्रिपाठी।

घुंघरुओं की आवाज, तबले की ताल और कथक के बोल बच्चों के खेल की तरह घर में गूंजते रहते थे। यही वह वातावरण था, जिसमें उनकी बेटी गौरी शर्मा त्रिपाठी का बचपन बीता।

लखनऊ से लिया प्रारंभिक शिक्षा

गौरी ने कथक की शिक्षा अपनी मां से प्राप्त की। शुरुआती मार्गदर्शन महान गुरु लच्छू महाराज से मिला, जबकि आगे चलकर उन्हें गुरु मोहनराव कल्याणपुरकर, पंडित बिरजू महाराज और गुरु केलुचरण महापात्र जैसे महान गुरुओं का सान्निध्य मिला। इस तरह उनकी कला कई परंपराओं के अनुभव से समृद्ध हुई।

गौरी शर्मा त्रिपाठी आज उन कथक कलाकारों में गिनी जाती हैं, जिन्होंने परंपरा को संभालते हुए उसे आधुनिक संदर्भों से जोड़ा। उनकी शैली में लखनऊ घराने की नजाकत और भावपूर्ण अभिव्यक्ति के साथ-साथ नई कल्पनाशीलता भी दिखाई देती है।

उनके लिए कथक केवल नृत्य नहीं, बल्कि कथा, भाव और विचार का संगम है। उनकी कोरियोग्राफिक प्रस्तुतियों में टाइमलैप्स और व्यूह जैसी रचनाएं खासा चर्चित रही हैं। इन प्रस्तुतियों में कथक की शास्त्रीय संरचना के भीतर समकालीन संवेदनाओं को पिरोया गया है।

गौरी का मानना है कि कथक की सबसे बड़ी खूबी उसकी कथा कहने की क्षमता है। यही कारण है कि उनके मंचन में भाव, अभिनय और ताल तीनों समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं।

Gauri Padma

अपनी गुरु और मां पद्मा शर्मा के साथ गौरी शर्मा त्रिपाठी।

मां की गोदी से ‘रॉयल अल्बर्ट हॉल तक का सफर

गौरी शर्मा त्रिपाठी ने कथक को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने रॉयल फेस्टिवल हॉल, रॉयल अल्बर्ट हॉल, म्यूनिख बिएनाले और मिलेनियम डोम जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुति दी। यह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य के लिए भी एक महत्वपूर्ण क्षण था।

उनके करियर का एक ऐतिहासिक पड़ाव तब आया जब उन्होंने वेस्टमिंस्टर एबी में आयोजित एक शाही समारोह के दौरान प्रस्तुति दी। यह सम्मान पाने वाली वह पहली भारतीय कलाकार बनीं।

गौरी ने अंतरराष्ट्रीय कलाकारों और संगीतकारों के साथ भी कई सहयोग किए। उनकी प्रस्तुतियों में तबला उस्ताद जाकिर हुसैन, संगीतकार ए.आर. रहमान और कई वैश्विक कलाकारों के साथ काम करने का अनुभव शामिल है। गौरी शर्मा त्रिपाठी केवल मंच की कलाकार नहीं हैं। वह एक समर्पित शिक्षिका भी हैं।

पिछले तीन दशकों में उन्होंने भारत, ब्रिटेन, यूरोप और अमेरिका सहित कई देशों में हजारों विद्यार्थियों को कथक सिखाया है. उन्होंने लंदन में ANKH Dance UK की स्थापना की और भारत में अमारा नृत्य कला हंसा के जरिए गुरु-शिष्य परंपरा को आगे बढ़ाया।

शिक्षा के क्षेत्र में उनका एक महत्वपूर्ण योगदान लंदन कंटेम्पररी डांस स्कूल के लिए कथक की डिग्री का पाठ्यक्रम तैयार करना रहा है। इसके अलावा वह ISTD South Asian Dance Faculty की संस्थापक फैकल्टी भी रही हैं।

महाभारत में उर्वसी बन अर्जुन को सिखाया था नृत्‍य

उनका मानना है कि कला तभी जीवित रहती है, जब वह नई पीढ़ी तक पहुंचे। गौरी शर्मा त्रिपाठी को भारतीय टेलीविजन दर्शक भी अच्छी तरह पहचानते हैं। बी.आर. चोपड़ा के लोकप्रिय धारावाहिक महाभारत में उन्होंने अप्सरा उर्वशी का किरदार निभाया था। उस दृश्य में उर्वशी अर्जुन को नृत्य सिखाती हैं और बाद में क्रोधित होकर उन्हें श्राप देती हैं।

Gauri InUrvashi

लोकप्रिय धारावाहिक महाभारत के एक दृश्‍य में अप्सरा उर्वशी के किरदार में गौरी शर्मा त्रिपाठी।

इस भूमिका में गौरी का अभिनय और नृत्य दोनों बेहद प्रभावशाली थे। आज भी दर्शक उन्हें उर्वशी के किरदार के लिए याद करते हैं। उन्होंने श्याम बेनेगल की ऐतिहासिक श्रृंखला ‘भारत एक खोज’ में भी कथक के माध्यम से भारतीय संस्कृति की झलक प्रस्तुत की।

तारिणी: विरासत की तीसरी कड़ी और भविष्य की नई ऊर्जा

कथक की इस विरासत की तीसरी कड़ी हैं तारिणी त्रिपाठी। तारिणी ने कथक की शिक्षा अपनी नानी गुरु पद्मा शर्मा और मां गौरी शर्मा त्रिपाठी से प्राप्त की। इस तरह उनकी कला तीन पीढ़ियों की साधना का परिणाम है।

उन्हें नालंदा डांस रिसर्च सेंटर से ‘नृत्य निपुण’ की उपाधि मिली और PECDA 2022 में ‘बेस्ट डांसर’ अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। उन्होंने काविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय से परफॉर्मिंग आर्ट्स में मास्टर्स किया है और यूके के इम्पीरियल सोसाइटी ऑफ टीचर्स ऑफ डांस के साथ भी अध्ययन किया है

ताल: द बिगिनिंग ..जहां परंपरा आगे बढ़ाई जाती है

तारिणी कई प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुति दे चुकी हैं, जिनमें NMACC, रॉयल ओपेरा हाउस, जोधपुर RIFF, नालंदा नृत्योत्सव और कथक महोत्सव शामिल हैं। इस परिवार की सबसे अनोखी प्रस्तुति है ‘Taal: The Beginning’ इस कार्यक्रम में गुरु पद्मा शर्मा, गौरी शर्मा त्रिपाठी और तारिणी तीनों पीढ़ियां एक साथ मंच पर आती हैं।

यह केवल एक नृत्य प्रस्तुति नहीं, बल्कि परंपरा की यात्रा है- जहां एक पीढ़ी अपनी साधना अगली पीढ़ी को सौंपती हुई दिखाई देती है। दर्शकों के लिए यह अनुभव केवल नृत्य देखने का नहीं, बल्कि कला की निरंतरता को महसूस करने का होता है।

Kathak Dancers

अपनी मां पद्मा शर्मा और बेटी तारिणी त्रिपाठी के साथ गौरी शर्मा त्रिपाठी।

यह केवल तीन कलाकारों की उपलब्धियों का विवरण नहीं, बल्कि उस स्त्री परंपरा की कहानी है जिसने कला को विरासत में बदल दिया। गुरु पद्मा शर्मा की साधना, गौरी शर्मा त्रिपाठी की वैश्विक दृष्टि और तारिणी की नई ऊर्जा- ये तीनों मिलकर कथक की एक ऐसी धारा बनाते हैं जो आने वाले समय में भी बहती रहेगी।

कथक में घुंघरू केवल नृत्य का हिस्सा नहीं होते। वे साधना, अनुशासन और परंपरा का प्रतीक होते हैं। जब गुरु अपने घुंघरू अगली पीढ़ी को सौंपते हैं, तो वह केवल कला नहीं, बल्कि जीवन का एक दृष्टिकोण भी सौंपते हैं।

पद्मा शर्मा से गौरी शर्मा त्रिपाठी और फिर तारिणी तक पहुंची यह विरासत हमें यह याद दिलाती है कि कला की असली ताकत उसकी निरंतरता में है. और जब यह निरंतरता स्त्रियों के हाथों आगे बढ़ती है, तो वह केवल परंपरा नहीं रहती- वह इतिहास बन जाती है।

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!