अपनी ही बीमारी पर रिसर्च कर तरुण ने एम्स से पूरी की पीएचडी, केवल 20 मिनट का प्राणायाम और सिकल सेल के दर्द से राहत

एम्स रायपुर के शोधार्थी तरुण साहू ने सिकल सेल बीमारी पर पीएचडी की है। उन्होंने 21 दिनों के डीप ब्रीथिंग (प्राणायाम) शोध में पाया कि यह मरीजों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारता है।

HighLights
- 21 दिन के प्राणायाम से सिकल सेल दर्द में कमी
- तरुण साहू ने अपनी बीमारी पर किया शोध
- हीमोग्लोबिन, डिप्रेशन, स्ट्रेस लेवल सामान्य हुए
डीप ब्रीथिंग की एक विशेष पद्धति पर किए गए शोध ने सिकलसेल (सिकलिन) बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए नई उम्मीद जगाई है। 21 दिनों तक चली इस रिसर्च में यह पाया गया कि नियमित डीप ब्रीथिंग से मरीजों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर उल्लेखनीय सकारात्मक असर पड़ता है। अब बिना किसी भारी दवा के सिर्फ 20 मिनट के नियमित प्राणायाम से इस बीमारी से होने वाले दर्द और दिमाग पर पड़ने वाले नकारात्मक असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
यह निष्कर्ष अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) रायपुर के शरीर क्रिया विज्ञान विभाग के शोधार्थी तरुण साहू के शोध से सामने आया है। उन्होंने ‘सिकल सेल बीमारी में धीमी-गहरी श्वास (प्राणायाम) का मस्तिष्क और शरीर की कार्यप्रणाली पर प्रभाव’ विषय पर पीएचडी की है। खास बात यह है कि तरुण खुद बचपन से इस बीमारी से पीड़ित रहे हैं। वर्षों तक असहनीय दर्द और अस्पतालों के चक्कर झेलने के बाद उन्होंने अपनी ही बीमारी को समझने और उसका समाधान खोजने का फैसला किया, जिसका नतीजा लोगों के लिए राहत के तौर पर सामने है।
तरुण ने 2018 में नेट क्वालीफाई करने के बाद 2020 में एम्स का एंट्रेंस एग्जाम क्लियर किया और सिकलिन पर रिसर्च शुरू की। उन्होंने 60 लोगों (30 सिकलिन पीड़ित और 30 स्वस्थ ) पर शोध किया। जांच में पता चला कि ब्रेन में आक्सीजन सही से न पहुंचने के कारण सिकलिन मरीजों में सोचने-समझने की क्षमता कम हो जाती है। इसे सुधारने के लिए तरुण ने प्राणायाम की एक ऐसी पद्धति विकसित की, जिसमें 20 मिनट तक प्राणायाम को अलग-अलग तरीकों से कसरत की तरह किया जाता है। मरीजों को लगातार 21 दिनों तक प्राणायाम की यह पद्धति कराई गई, जिसके नतीजे सार्थक निकले।

बिना भारी दवा के मिले चौंकाने वाले नतीजे
सामान्य लोगों में डिप्रेशन लेवल 10 से 12 और स्ट्रेस लेवल 15 से 20 होता है, जबकि मरीजों में यह 25 से 30 और 45 से 50 था। सभी मरीजों का हीमोग्लोबिन भी सिर्फ 06 से 08 के बीच था। 21 दिन की रिसर्च पूरी होने के बाद सभी मरीजों का हीमोग्लोबिन, डिप्रेशन और स्ट्रेस लेवल एकदम सामान्य हो गया। इस पद्धति के साथ हाइड्रोक्सीयूरिया (सिकलिन पीड़ितों को दी जाने वाली दवा) भी दी गई, और उनके ईसीजी सहित कई टेस्ट किए गए, जो सामान्य रहे। तरुण ने यह पद्धति खुद पर भी आजमाई। एक समय उन्हें प्रत्येक महीने ब्लड की आवश्यकता होती थी, लेकिन बीते सात सालों से वह बिना अतिरिक्त ब्लड के पूरी तरह स्वस्थ हैं।
दिमाग और दिल पर पाजिटिव असर
डीप ब्रीथिंग की इस पद्धति से मरीज की हृदय गति धीमी होती है, ब्लड प्रेशर स्थिर रहता है और ब्रेन में आक्सीजन व ऊर्जा बढ़ती है। इससे क्रोनिक दर्द और सांस फूलने की समस्या में राहत मिलती है। बिना किसी साइड इफेक्ट के दिमागी क्षमता बढ़ाने का यह एक बेहतरीन तरीका है। विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डा. रंजन सिन्हा के मार्गदर्शन में हुए इस रिसर्च में डा. मीनाक्षी सिन्हा, डा. एली महापात्रा, डा. प्रीतम वासनिक और डा अविनाश इंगले का साथ रहा।

ऐसे लिया पीड़ितों के लिए कुछ करने का निर्णय
तरुण की जिंदगी बचपन से ही संघर्षों से भरी रही। वह बताते हैं कि जब वह मात्र एक वर्ष के थे, तब लगातार बिगड़ती तबीयत के कारण परिवार उन्हें अस्पताल लेकर गया। जांच में पता चला कि वह सिकलसेल बीमारी से पीड़ित हैं। इसके बाद उनका पूरा बचपन असहनीय दर्द और बार-बार अस्पताल के चक्कर लगाते हुए बीता। हालात ऐसे थे कि स्कूल से ज्यादा समय उन्हें अस्पताल के बिस्तर पर गुजारना पड़ता था।
बीमारी की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई बार एक ही दिन में उन्हें चार-चार बोतल खून चढ़ाना पड़ता था। 12वीं कक्षा के दौरान के एक अनुभव ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। एक दिन जब वह ब्लड चढ़वाने अस्पताल पहुंचे, तो उनकी आंखों के सामने सिकलसेल से पीड़ित दो मरीजों की मौत हो गई। उस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उसी क्षण उन्होंने तय कर लिया कि वह इस बीमारी के पीड़ितों के लिए कुछ न कुछ जरूर करेंगे।

आपरेशन टेबल से लेकर गोल्ड मेडलिस्ट तक का सफर
भिलाई-03 पदुमनगर निवासी तरुण ने 2014 में साइंस कालेज दुर्ग से अपनी पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और बायोकेमिस्ट्री में एमएससी का अध्ययन शुरू किया। 2017 में लास्ट सेमेस्टर की परीक्षा में सिर्फ 15 दिन बचे थे, तभी डाक्टर ने बताया कि सिकलिन की वजह से पित्त की थैली में पथरी हो गई है और इसे निकालने के लिए आपरेशन जरूरी है। आपरेशन के बाद दर्द के चलते उन्हें न नींद आती थी और न ही भूख लगती थी। दर्द और बेचैनी के बीच उन्होंने परीक्षा दी और यूनिवर्सिटी के साथ छत्तीसगढ़ में टाप कर गोल्ड मेडल हासिल किया।



