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शून्य से शिखर तक: बंगाल में भाजपा का उभार, क्या तृणमूल के किले में लगेगी सेंध?

कोलकाता:
भारतीय जनता पार्टी का पश्चिम बंगाल में तेजी से बढ़ता राजनीतिक प्रभाव अब राज्य की सत्ता के समीकरण को बदलता नजर आ रहा है। कभी हाशिए पर रहने वाली यह पार्टी अब मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभर चुकी है और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती बन गई है।

बंगाल की राजनीति में भाजपा की शुरुआत बेहद सीमित रही। 2001, 2006 और 2011 के विधानसभा चुनावों में पार्टी अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी। उस समय राज्य की राजनीति मुख्य रूप से वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सिमटी हुई थी। भाजपा शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित रही और उसका जनाधार बहुत छोटा था।

हालांकि, 2014 के लोकसभा चुनाव ने भाजपा के लिए नया रास्ता खोल दिया। इस चुनाव में पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़कर करीब 17 प्रतिशत पहुंच गया और उसने दो सीटों पर जीत दर्ज की। यह संकेत था कि पार्टी राज्य में अपनी जमीन तैयार कर रही है।

इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ऐतिहासिक प्रदर्शन किया। पार्टी ने 18 सीटें जीतकर लगभग 40 प्रतिशत वोट हासिल किए। इस परिणाम ने न केवल राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाया, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि भाजपा अब बंगाल की राजनीति में स्थायी ताकत बन चुकी है।

2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को केवल 3 सीटें मिली थीं, लेकिन 2021 के चुनाव में पार्टी ने 77 सीटें जीतकर बड़ी छलांग लगाई। इस दौरान उसका वोट प्रतिशत भी 10 प्रतिशत से बढ़कर 38 प्रतिशत तक पहुंच गया। इस प्रदर्शन ने भाजपा को राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बना दिया।

विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा के उभार के पीछे कई कारण हैं। 2011 में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस की जीत के बाद वाम मोर्चा का पतन हुआ। वाम दलों और कांग्रेस का वोट बैंक धीरे-धीरे भाजपा और तृणमूल के बीच बंट गया।

इसके अलावा, भाजपा ने संगठन स्तर पर भी लगातार काम किया। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की मजबूत पकड़ और आक्रामक चुनाव प्रचार ने पार्टी को फायदा पहुंचाया। वहीं, तृणमूल सरकार के खिलाफ कुछ इलाकों में असंतोष भी भाजपा के लिए अवसर बना।

फिलहाल, तृणमूल कांग्रेस अभी भी सत्ता में मजबूत स्थिति में है, लेकिन भाजपा की बढ़ती ताकत ने मुकाबले को सीधा और दिलचस्प बना दिया है।

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