Dollar vs Rupee: रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया, 96.20 प्रति डॉलर तक टूटा; जानिए गिरावट की बड़ी वजहें

नई दिल्ली: भारतीय रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है। सोमवार, 18 मई 2026 को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.20 के ऐतिहासिक निचले स्तर तक फिसल गया। यह पहली बार है जब भारतीय मुद्रा इतनी कमजोर हुई है। विदेशी बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता, मध्य-पूर्व में जारी तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने रुपये पर भारी दबाव बना दिया है।
सोमवार को शुरुआती कारोबार में रुपया अपने पिछले बंद स्तर से करीब 0.2 फीसदी कमजोर होकर 96.20 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। इससे पहले शुक्रवार को भी रुपया 96.14 के निचले स्तर तक गिरा था और अंत में 95.97 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। पिछले कुछ दिनों में भारतीय मुद्रा में लगातार कमजोरी देखी जा रही है।
मध्य-पूर्व संकट बना सबसे बड़ा कारण
विशेषज्ञों के मुताबिक, रुपये की गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह मध्य-पूर्व में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है। संयुक्त अरब अमीरात में एक न्यूक्लियर पावर प्लांट पर हमले की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में डर का माहौल बन गया। इसके चलते निवेशकों ने सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख किया और अमेरिकी डॉलर की मांग तेजी से बढ़ी।
इसके अलावा अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई की आशंकाओं ने भी बाजार की चिंता बढ़ा दी है। वैश्विक निवेशक फिलहाल जोखिम लेने से बच रहे हैं, जिसका असर उभरते बाजारों की मुद्राओं पर साफ दिखाई दे रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी सीधे रुपये पर दबाव डालती है। सोमवार को ब्रेंट क्रूड की कीमत 111 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो पिछले कई महीनों का उच्च स्तर है।
महंगे तेल का मतलब है कि भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ेंगे। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है। जानकारों का कहना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो भारत का आयात बिल और व्यापार घाटा दोनों बढ़ सकते हैं।
व्यापार घाटा और कम विदेशी निवेश भी चिंता का कारण
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत का बढ़ता व्यापार घाटा और कमजोर विदेशी पूंजी प्रवाह भी रुपये की गिरावट को बढ़ा रहा है। वैश्विक अनिश्चितता के बीच विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी एसेट्स में निवेश कर रहे हैं।
इसके चलते डॉलर की मांग बढ़ रही है, जबकि रुपये की सप्लाई अधिक हो रही है। यही कारण है कि भारतीय मुद्रा पर लगातार दबाव बना हुआ है।
सरकार और RBI ने बढ़ाई निगरानी
रुपये की गिरावट को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार और Reserve Bank of India लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। सरकार ने कीमती धातुओं, खासकर चांदी के आयात पर कुछ प्रतिबंध लगाए हैं ताकि डॉलर की मांग कम की जा सके।
वहीं Reserve Bank of India ने विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप बढ़ाया है। आरबीआई ने बैंकों की ‘नेट ओपन पोजिशन’ से जुड़े नियमों को भी सख्त किया है ताकि अत्यधिक सट्टेबाजी को रोका जा सके।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
रुपये की कमजोरी का असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ सकता है। पेट्रोल-डीजल महंगा होने की आशंका बढ़ सकती है, जिससे परिवहन लागत और महंगाई में इजाफा हो सकता है। विदेश में पढ़ाई, यात्रा और आयातित इलेक्ट्रॉनिक सामान भी महंगे हो सकते हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक हालात में सुधार होता है और तेल की कीमतें नियंत्रित रहती हैं तो आने वाले समय में रुपये को कुछ राहत मिल सकती है।



