बीजेपी सरकार बंगाल में शाकाहार थोपने की कोशिश कर रही है: ओ’ब्रायन

कोलकाता, पश्चिम बंगाल। त्रिणमूल कांग्रेस के संयुक्त सचिव डेरेक ओ’ब्रायन ने भाजपा सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा है कि भाजपा बंगाल में शाकाहार थोपने की कोशिश कर रही है, जो न केवल गलत है बल्कि बच्चों के लिए पोषण की कमी पैदा करने वाली भी है। उन्होंने हाल ही में सरकार की घरेलू खाद्य योजनाओं में बदलाव पर कड़ी आपत्ति जताई।
डेरेक ओ’ब्रायन ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा, “राजनीतिक विरोधियों पर अंडे फेंकना तो ठीक है, लेकिन मध्याह्न भोजन योजना से अंडे हटाकर बच्चों को पोषण से वंचित करना कतई स्वीकार्य नहीं है। यह स्पष्ट रूप से शाकाहार को थोपने की कोशिश है, जो बंगाल की धरती पर कभी नहीं चलेगा।”
उन्होंने आगे कहा कि मध्याह्न भोजन योजना का उद्देश्य बच्चों को आवश्यक पोषण सुनिश्चित करना है, जिसमें अंडे प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। “जब सरकार ने अंडे को इस योजना से बाहर कर दिया, तो इसका सीधा असर गरीब बच्चों की सेहत पर पड़ेगा। यह कदम न केवल पोषण के खिलाफ है, बल्कि सामाजिक तौर पर भी विभाजन पैदा करता है।”
ओ’ब्रायन के अनुसार, बंगाल की जनता अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विविधता के लिए जानी जाती है, जहाँ मांसाहार या अंडे का सेवन व्यक्तिगत पसंद के आधार पर होता है। उन्होंने जोर दिया कि किसी भी राजनीतिक दल को समाज पर शाकाहार थोपने का अधिकार नहीं है।
त्रिणमूल कांग्रेस ने इस विषय को लेकर कई जगह विरोध प्रदर्शन भी किए हैं और भाजपा की नीति को लोगों के हितों के खिलाफ बताया है। पार्टी ने आशंका जताई है कि यदि ऐसी नीतियां जारी रहीं तो वे बच्चों के विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करेंगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि अंडे में विटामिन, प्रोटीन और अन्य आवश्यक पोषक तत्व होते हैं जो बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक हैं। मध्याह्न भोजन योजना से अंडे हटाने का मतलब पोषण के स्तर में गिरावट संभव है, जो लंबे समय में स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकती है।
इस मुद्दे पर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम भाजपा का सांस्कृतिक ध्रुवीकरण करने वाला प्रयास हो सकता है, जो बंगाल के बहुपक्षीय समाज के लिए खतरनाक है। विपक्षी दल लगातार इस नीति के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और जनता के बीच जागरूकता बढ़ा रहे हैं।
राज्य सरकार ने अब तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, जबकि भाजपा के प्रतिनिधियों ने इसे सामाजिक सुधार और स्वास्थ्य जागरूकता का प्रयास बताते हुए समर्थन किया है।
बंगलादेश और पूर्वोत्तर राज्यों की सीमाओं से सटे बंगाल में यह विवाद ना केवल राजनीतिक बहस बन रहा है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान के सवालों को भी छू रहा है। भविष्य में यह देखने वाली बात होगी कि इस पर आगे क्या कार्रवाई होती है और Bengal की जनता की भूमिका क्या रहती है।



