IIT Madras की बड़ी खोज: पक्षियों की तरह आकार बदलेंगे विमान के पंख, ‘मार्फिंग स्किन’ तकनीक से टलेगा स्टॉल का खतरा

चेन्नई, तमिलनाडु
विमानन क्षेत्र में उड़ान को अधिक सुरक्षित और कुशल बनाने की दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास के वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण तकनीक विकसित की है। ‘मार्फिंग स्किन’ (Morphing Skin) नाम की यह तकनीक पक्षियों की उड़ान से प्रेरित है। इसके जरिए विमान के पंख उड़ान के दौरान हवा की परिस्थितियों के अनुसार अपना आकार और सतह बदल सकेंगे।
इस तकनीक का उद्देश्य विमान के पंखों को पारंपरिक कठोर संरचना के बजाय ऐसी अनुकूली क्षमता देना है, जिससे वे अलग-अलग उड़ान परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन कर सकें। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में इस तरह की तकनीक विमान की स्थिरता, ईंधन दक्षता और उड़ान सुरक्षा को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।
पक्षियों से मिली तकनीक की प्रेरणा
पक्षी उड़ान के दौरान अपने पंखों के आकार, कोण और सतह को लगातार बदलते रहते हैं। हवा की दिशा और गति में बदलाव होने पर वे अपने पंखों को उसी के अनुसार ढाल लेते हैं। इसी प्राकृतिक क्षमता से प्रेरणा लेकर वैज्ञानिकों ने विमान के पंखों के लिए मार्फिंग स्किन विकसित करने की दिशा में काम किया है।
इस तकनीक में पंख की बाहरी सतह को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वह जरूरत के अनुसार अपना आकार बदल सके। इसका उद्देश्य विमान के पंखों को बदलती वायुगतिकीय परिस्थितियों के अनुरूप अधिक प्रभावी ढंग से काम करने में सक्षम बनाना है।
एयरोडायनेमिक स्टॉल से निपटने में मदद
विमान की उड़ान के दौरान सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक एयरोडायनेमिक स्टॉल है। जब पंख के ऊपर से हवा का प्रवाह आवश्यक सीमा तक सुचारु नहीं रहता, तो पंख द्वारा पैदा होने वाला लिफ्ट तेजी से कम हो सकता है। इससे विमान की उड़ान प्रभावित होने का खतरा पैदा होता है।
मार्फिंग स्किन तकनीक का उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों में पंखों की ज्यामिति को अनुकूलित करना है, ताकि हवा के प्रवाह को बेहतर बनाए रखा जा सके और स्टॉल की स्थिति की संभावना को कम करने में मदद मिले।
उड़ान सुरक्षित होने के साथ ईंधन की भी बचत
इस तकनीक का संभावित लाभ केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यदि विमान के पंख अलग-अलग उड़ान परिस्थितियों के अनुसार अपना आकार बेहतर ढंग से अनुकूलित कर सकें, तो एयरोडायनेमिक दक्षता में सुधार हो सकता है। इससे विमान को उड़ाने के लिए आवश्यक ऊर्जा कम करने और ईंधन की खपत घटाने में मदद मिल सकती है।
ईंधन की खपत कम होने का सीधा असर विमानन क्षेत्र से होने वाले कार्बन उत्सर्जन पर भी पड़ सकता है। हालांकि, इस तकनीक के व्यापक व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले इसके प्रदर्शन, विश्वसनीयता और सुरक्षा का विभिन्न परिस्थितियों में परीक्षण जरूरी होगा।
IIT मद्रास की यह पहल विमानन तकनीक में प्रकृति से प्रेरित इंजीनियरिंग के बढ़ते इस्तेमाल का उदाहरण है। यदि इस तकनीक को व्यावहारिक स्तर पर सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो आने वाले समय में विमान के पंख पारंपरिक कठोर संरचनाओं के बजाय उड़ान के दौरान परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने में सक्षम हो सकते हैं।



