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लखनऊ। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (यूपीपीएससी) द्वारा चयन प्रक्रिया से जुड़े माइग्रेशन नियम में बिना सार्वजनिक सूचना के किए गए बदलाव को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। सामाजिक संगठनों और अभ्यर्थियों का आरोप है कि इस निर्णय से आयोग की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं और ओबीसी, ईडब्ल्यूएस, एससी, एसटी, दिव्यांग व महिला अभ्यर्थियों के संवैधानिक आरक्षण अधिकारों का हनन हो रहा है।
सामाजिक न्याय चिंतक एवं भारतीय ओबीसी महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौ. लौटनराम निषाद ने आरोप लगाया कि यूपीपीएससी सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों का पालन नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2023 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दीपा ईवी एवं इलाहाबाद हाईकोर्ट के एकलपीठ के ओवरलैपिंग निर्णय को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया था कि चयन का आधार केवल मेरिट होना चाहिए। आरक्षित वर्ग के वे मेधावी अभ्यर्थी, जिनके अंक सामान्य वर्ग के बराबर या उससे अधिक हों, उनका समायोजन अनारक्षित श्रेणी में किया जाना चाहिए। इसके विपरीत सामान्य से अधिक अंक पाने वाले ओबीसी, एससी, एसटी अभ्यर्थियों को केवल उनके आरक्षित कोटे में सीमित करना न्यायसंगत नहीं है।
चौ. लौटनराम निषाद ने कहा कि यूपीपीएससी इन निर्देशों की खुलेआम अनदेखी कर रहा है, जिससे मेरिटधारी अभ्यर्थियों के साथ गंभीर अन्याय हो रहा है। उन्होंने बताया कि आयोग की बैठक दिनांक 09 जनवरी 2020 में यह असाधारण निर्णय लिया गया, जिसका आधार 10 दिसंबर 2019 की बैठक (पत्रावली संख्या 27/मिस/एस-10/2019-20) बताया गया है। इस निर्णय के अनुसार यदि आरक्षित वर्ग का कोई अभ्यर्थी प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा, साक्षात्कार या स्क्रीनिंग परीक्षा के किसी भी चरण में अर्हकारी मानकों में दी गई छूट या शिथिलीकरण का लाभ नहीं लेता है, तभी उसे अंतिम चयन में अनारक्षित श्रेणी में समायोजित किया जाएगा, बशर्ते उसके अंक अनारक्षित वर्ग के न्यूनतम कटऑफ से अधिक हों। अन्यथा अभ्यर्थी अंतिम चयन तक अपनी मूल श्रेणी में ही रहेगा।
उन्होंने कहा कि सबसे विवादास्पद पहलू यह है कि आयोग ने इस नियम को तत्काल प्रभाव से लागू करते हुए उन सभी पुराने विज्ञापनों पर भी लागू कर दिया, जिनके परिणाम अभी घोषित नहीं हुए थे। विशेषज्ञों के अनुसार, भर्ती प्रक्रिया के दौरान नियमों में इस तरह का बदलाव न्याय के स्थापित सिद्धांतों के विरुद्ध है।
अभ्यर्थियों का कहना है कि इस निर्णय के चलते कई मामलों में आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार अनारक्षित श्रेणी से अधिक अंक प्राप्त करने के बावजूद चयन से वंचित रह जा रहे हैं। यह स्थिति न केवल आरक्षण की मूल भावना, बल्कि समान अवसर के संवैधानिक प्रावधानों के भी विपरीत है। साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि यदि नियम बदलना ही था, तो उसकी पूर्व सूचना क्यों नहीं दी गई और अभ्यर्थियों से पारदर्शी संवाद क्यों नहीं किया गया।
यह मामला अब एक प्रशासनिक निर्णय से आगे बढ़कर संवैधानिक आरक्षण को निष्प्रभावी बनाने की कथित रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। इससे यूपीपीएससी की चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं।
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