भारत में रेबिज मौतों के आंकड़ों में अंतर बड़ा चुनौती

भारत में रेबिज से होने वाली मौतों के आंकड़ों में भारी अंतर है, जो रोग नियंत्रण में बड़ी बाधा उत्पन्न करता है। जबकि देश 2030 तक कुत्ते-जनित मानव रेबिज उन्मूलन का लक्ष्य रखता है, न तो स्वास्थ्य मंत्रालय के डेटा में और न ही अन्य राष्ट्रीय स्रोतों में रेबिज कारण मौतों का सटीक और व्यापक रिकॉर्ड उपलब्ध है।
अलग-अलग स्रोतों के आंकड़ों में बड़ा फर्क
आईसी एमआर-राष्ट्रीय महामारी विज्ञान संस्थान (ICMR-NIE) द्वारा किए गए एक सामुदायिक अध्ययन के अनुसार भारत में हर साल लगभग 5,726 लोग रेबिज के कारण मरते हैं। इस अध्ययन को हाल ही में The Lancet Infectious Diseases में प्रकाशित किया गया। हालांकि, स्वास्थ्य मंत्रालय के इंटीग्रेटेड डिजीज सर्विलांस प्रोग्राम (IDSP-IHIP) डेटा में 2024 में केवल 54 मौतें दर्ज हैं। वहीं, मेडिकल सर्टिफिकेशन ऑफ कॉज ऑफ डेथ (MCCD) प्रणाली ने 2023 में 271 रेबिज मौतें दर्ज कीं, लेकिन यह केवल चिकित्सा पुष्टि वाली घटनाओं को दिखाती है।
दोनों आंकड़े सीधे तुलना योग्य नहीं हैं क्योंकि IDSP-IHIP एक रोग निगरानी प्रणाली है जबकि MCCD नागरिक पंजीकरण के तहत चिकित्सीय मृत्यु प्रमाणन प्रदान करता है। MCCD केवल 22% से अधिक मौतों को कवर करता है, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर पूर्ण गिनती नहीं माना जा सकता।
रेबिज रोकथाम और चुनौतीपूर्ण आंकड़ा एकत्रीकरण
ICMR के अध्ययन में 60 जिलों के 15 राज्यों में 78,807 घरों में 3,37,808 लोगों का सर्वेक्षण शामिल था। इस सर्वेक्षण में सालाना लगभग 9.1 मिलियन जानवर काटने के मामले सामने आए, जिनमें से 5.6 मिलियन कुत्तों के काटने के थे। शोधकर्ताओं ने एक संभावित निर्णय-वृक्ष मॉडल के जरिए रेबिज से होने वाली मौतों का अनुमान लगाया है, जो निगरानी या अस्पताल रिकॉर्ड पर आधारित नहीं है।
स्वास्थ्य मंत्रालय का मानना है कि रेबिज के मामले और मौतें जहां होती हैं वहां की निगरानी पूरी नहीं होती, जिससे संपूर्ण डेटा संग्रह में कमी रह जाती है। इससे न केवल बीमारी के वास्तविक आंकड़े छुप जाते हैं, बल्कि उन्मूलन योजनाओं में भी बाधा आती है।
नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल ने मानव रेबिज को सभी राज्यों में नोटिफिएबल रोग बनाने के प्रयास जारी रखे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आवारा कुत्तों का टीकाकरण, मानवों के लिए त्वरित पोस्ट-एक्सपोजर वैक्सीनेशन और रेबिज संक्रमण श्रृंखला का तोड़ना जरूरी है।
एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 20% कुत्ते काटने के शिकार लोगों ने रेबिज का टीका नहीं लगवाया, जबकि केवल 66.2% ने कम से कम तीन खुराक प्राप्त की। इनमें से आधे लोगों ने टीकाकरण पूरा नहीं किया। केवल 10% लोगों ने निष्क्रिय रोगनिरोधी इम्यूनाइजेशन लिया।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) बताता है कि इंसानों में 99% रेबिज संक्रमण घरेलू कुत्तों के काटने से होता है। भारत विश्व भर में होने वाली रेबिज मौतों का 35% हिस्सा है और एशियाई देशों में लगभग 59.9% मौतें भारत से होती हैं। यह खासतौर पर बच्चों के लिए खतरा है, क्योंकि लगभग 40% काटे गए लोग 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे होते हैं।
लेखकों और विशेषज्ञों के अनुसार, भारत ने दो दशकों में रेबिज से होने वाली मौतों में कमी की है, लेकिन 2030 के लक्ष्य को पाने के लिए ‘वन हेल्थ’ रणनीति के तहत मानव और पशु निगरानी के सशक्तीकरण, पूरी पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफाइलेक्सिसिस और कुत्तों के टीकाकरण को तेज करना आवश्यक है। यह कदम देश में रेबिज नियंत्रण और उन्मूलन की दिशा में अहम साबित होंगे।




