केबीआर फ्लाईओवर विवाद को लेकर तेलंगाना सरकार पर नागरिकों की खरी-खोटी

हैदराबाद के केंद्र में स्थित कासू ब्रह्मानंद रेड्डी (KBR) नेशनल पार्क के आसपास सड़क संरचना को लेकर तेलंगाना सरकार को भारी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। जीएचएमसी ने पार्क के आसपास सात फ्लाईओवर और सात अंडरपास बनाने की योजना को वापस लेते हुए नया फैसला लिया है।
डिजाइन में बदलाव और निर्माण योजना
अब ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (GHMC) ने जुबिली हिल्स चेकपोस्ट से लेकर एनएफसीएल जंक्शन तक एक कंटीन्युअस यूनिफाइड एलिवेटेड कॉरिडोर बनवाने की मंजूरी दी है। इस निर्माण कार्य को दो पैकेज में बांटा गया है—पहला जुबिली हिल्स चेकपोस्ट से बनजारा हिल्स रोड नंबर 2 तक, और दूसरा वहां से मुफ़ाख़्कम जहाँ कॉलेज तक जिसमें बनजारा हिल्स रोड नंबर 1 के लिए एक जुड़ने वाला रैंप भी शामिल है।
जीएचएमसी के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि डिज़ाइन बदलने के बावजूद नए टेंडर जारी नहीं किए जाएंगे, क्योंकि पहले की डिजाइन पर 50% काम पहले ही पूरा हो चुका है।
प्रोजेक्ट लागत और विवाद
परियोजना की स्वीकृत कुल लागत ₹1,090 करोड़ ही बनी हुई है। अधिकारियों का दावा है कि डिज़ाइन बदलाव से कुल ₹1,200 करोड़ की बचत हुई है, जिसमें से ₹800 करोड़ उच्च मूल्य वाली निजी जमीन अधिग्रहण की जरूरत कम होने से और ₹400 करोड़ निर्माण लागत में बचत हुई है।
GHMC के कमिश्नर आर.वी. करण ने बताया कि उड़ान मार्ग के डिज़ाइन में परिवर्तन, एक-तरफा यातायात के सफल परिणाम को देखकर किया गया। सोमवार को स्थल निरीक्षण के बाद उन्होंने मीडिया से बातचीत की।
डिज़ाइन परिवर्तन को GHMC स्टैंडिंग कमेटी के अनुमोदन के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना की। नागरिकों ने संसाधनों की बर्बादी और अचानक बदलाव पर सवाल उठाए।
शहर के वास्तुविद शंकर नारायण ने पूछा कि ‘‘कैसे एक माह में फ्लाईओवर से सीधे मार्ग में इतना बड़ा बदलाव संभव हुआ? क्या कोई यातायात अध्ययन हुआ या यह ठेकेदार के लिए कोई मुआवजा है?’’
“सेव केबीआर” समूह ने नए प्रोजेक्ट की डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) न बनाए जाने और पुराने पेड़ों की कटाई के लिए चिंता जताई है। पर्यावरण कार्यकर्ता नताशा रामरत्नम ने पूछा कि कैसे इतनी बड़ी योजना का अध्ययन किए बिना इसे हमेशा के लिए छोड़ा गया। उन्होंने खर्च और पर्यावरणीय नुकसान की जिम्मेदारी तय करने की मांग की।
GHMC ने ट्रैफिक पुलिस को इस विवाद का जिम्मेदार बताया जिनकी वजह से एक-तरफा ट्रायल छह महीने तक टल गया था। अधिकारियों के अनुसार देरी के कारण परियोजना पर ज्यादा खर्च हो गया और अब कानूनी जटिलताओं के कारण ठेका रद्द करना मुश्किल है।




