प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘अत्यधिक नैतिक कायरता’ के लिए कांग्रेस का हमला, कहा- इज़राइल के सबसे बड़े समर्थक बने

नई दिल्ली, भारत
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि उन्होंने ईरान के राज्य प्रमुख की नाकाम हत्या पर कभी एक शब्द भी नहीं बोला, और गाजा में जारी इज़राइली नरसंहार की भी निंदा नहीं की। जयराम रमेश की इस टिप्पणी ने राजनीतिक गोलेबारी को बढ़ा दिया है और देश में इस विषय पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।
जयराम रमेश ने एक प्रेस वार्ता में कहा, “प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति की हत्या को कभी सार्वजनिक रूप से निंदा नहीं की। इसके अलावा गाजा में हो रहे बार-बार के हमलों को देखकर भी वे चुप्पी साधे रहे। यह उनकी नैतिक कायरता की पराकाष्ठा है कि वे इज़राइल के सबसे मजबूत समर्थक बने हुए हैं, भले ही वह निर्दोष नागरिकों पर कब्रासती कर रहा हो।”
कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि इस तटस्थता की कमी और चुप्पी, भारत की विदेश नीति के समुचित मापदंडों के विरुद्ध है, खासकर जब देश इससे जुड़ी गंभीर मानवीय पहलुओं का सामना कर रहा हो। उन्होंने मोदी सरकार से इस मुद्दे पर तुरन्त स्पष्टता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हस्तक्षेप करने का आग्रह किया।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, जयराम रमेश के बयान ने मोदी की विदेश नीति की आलोचना को तेज कर दिया है और विपक्ष ने इसे जल्दबाजी में विदेश मामलों में पक्षपात के रूप में देखना शुरू कर दिया है। वहीं, कुछ समर्थक इसे अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत की सावधानीयुक्त नीति के रूप में देखते हैं।
यह विवाद ऐसे समय में उठाया गया है जब इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच संघर्ष तीव्र हो चुका है और वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों की गंभीर चिंताएं उठी हैं। भारत की स्थिति को लेकर कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बहस हो रही है। जयराम रमेश के बयान ने यहाँ एक नई बहस को जन्म दिया है कि क्या भारत को इस तरह के मुद्दों पर स्पष्ट एवं सशक्त प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर कांग्रेस का समर्थन करते हुए मोदी सरकार से पारदर्शिता की मांग की है और कहा है कि मानवाधिकारों की रक्षा करना हर देश की प्राथमिकता होनी चाहिए। यह भी कहा गया है कि भारत को वैश्विक मंच पर मानवीय मूल्यों के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए।
वहीं, राजनयिक सूत्र बताते हैं कि भारत की विदेश नीति हमेशा संतुलित और संवेदनशील रही है, लेकिन बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में सीधे हस्तक्षेप से बचने की कोशिश की जाती है ताकि देश की सुरक्षा और हितों को सर्वोपरि रखा जा सके।
इस पूरे विवाद के बीच, राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आगामी समय में यह मुद्दा चुनावी राजनीति में भी एक अहम विषय बन सकता है, खासकर तब जब मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों की बहस तेज हो रही है।
अंत में, यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री मोदी के इस विषय पर रुख को लेकर मतभेद गहराए हैं और राजनीतिक दल इसे लेकर अपनी-अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं।



