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विश्व शरणार्थी दिवस 2026: शरणार्थियों ने बंगाली भोजन को कैसे बदला

कोलकाता, पश्चिम बंगाल – हर साल 20 जून को मनाया जाने वाला विश्व शरणार्थी दिवस इस बार भी हमें उन अनगिनत शरणार्थियों की कहानियाँ याद दिलाता है जिन्होंने अपने संघर्ष और सांस्कृतिक विरासत के जरिए बंगाल के खानपान को गहराई से प्रभावित किया है। विशेष रूप से, बांग्लादेश से आए शरणार्थी, चिनी, बर्मीज़, और अंडमान ने अपनी विशिष्ट पाक संस्कृति को इस क्षेत्र में घोलकर बंगाली भोजन को एक नया रंग दिया है।

बंगाल के पारंपरिक व्यंजनों में बदलाव और विविधता का बड़ा कारण इन समुदायों का योगदान है। उदाहरण के तौर पर, शून्य अपशिष्ट (Zero Waste) पकाने की विधि, जिसमें किसी भी सामग्री का पूर्ण उपयोग किया जाता है, शरणार्थी समुदायों से आई है। यह विधि न केवल भोजन की गुणवत्ता को बढ़ाती है बल्कि पर्यावरण के प्रति भी जागरूकता बढ़ाती है।

मीन (मछली) की मामूली मिर्ची वाली करी जो शरणार्थियों द्वारा विकसित की गई थी, अब बंगाली खाने का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। ये छोटी-छोटी तकनीकें और पारंपरिक व्यंजन इस क्षेत्र के खानपान में बदलाव लाते रहे हैं।

इसके अलावा, बर्मा (म्यांमार) से आए शरणार्थियों ने बर्मीज नूडल सूप जैसे व्यंजन बंगाल में लोकप्रिय किए हैं। यह एक हल्का और पौष्टिक सूप है जो स्थानीय स्वाद के साथ मेल खाता है। अंडमान के प्रवासियों के किचन से प्रभावित कई ऐसी रेसिपी आज बंगाल के कई हिस्सों में घरों और रेस्तरांओं में परोसी जाती हैं।

सशक्त पाक परंपराओं का मेल और पाक संस्कृतियों का मिश्रण न केवल स्वादिष्ट भोजन लाता है बल्कि सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक भी है। यह बताता है कि शरणार्थी अपनी पहचान केवल संघर्ष के माध्यम से नहीं, बल्कि अपनी कला, भोजन और संस्कृति से कैसे स्थापित करते आए हैं।

पाक कला के इन नवाचारों के साथ, बंगाल ने जो विविधता हासिल की है, वह समृद्धि और सहिष्णुता का संदेश देती है। इस विश्व शरणार्थी दिवस पर, हमें उन सभी शरणार्थियों को याद करना चाहिए जिन्होंने बंगाली भोजन और संस्कृति को समृद्ध किया है।

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