छत्तीसगढ़

बस्तर अब हिंसा नहीं, सिनेमा के पर्दे पर अपने नए रंग और रौनक दिखा रहा है।

🌿 गोलियों से कैमरे तक का सफर

बस्तर की धरती कभी माओवादी हिंसा और बंदूकों के साए में कैद थी, लेकिन अब वहां कैमरों की चमक और लाइट्स की झिलमिलाहट दिखने लगी है। एक समय जहां सुरक्षा बलों की आवाजाही से जंगल डरते थे, वहीं आज फिल्म यूनिट के लोग वहां की प्रकृति और संस्कृति को कैमरे में कैद कर रहे हैं।

🎬 फिल्मी दुनिया की नई मंज़िल

‘दण्डा कोटुम’, ‘माटी’, ‘आरजे बस्तर’ और ‘मुंदरा मांझी’ जैसी फिल्मों की शूटिंग ने बस्तर को नई पहचान दी है। यहां की अद्भुत प्राकृतिक सुंदरता, आदिवासी लोककथाएं और शांत होते जंगल, फिल्म निर्माताओं के लिए स्वर्ग साबित हो रहे हैं।

🧑‍🎨 स्थानीय कलाकार, नई उम्मीद

फिल्म निर्देशक अमलेश नागेश की यूनिट में लगभग 150 लोग शामिल हैं, जिनमें कई स्थानीय युवा, कलाकार और महिलाएं भी हैं। गांव की महिलाएं भोजन तैयार करती हैं, बच्चे फिल्म सेट पर कलाकारों के पीछे भागते हैं, और गांवों में पहली बार कैमरा घूमता दिखा।

🎞 इतिहास की झलक

1957 में स्वीडिश फिल्म ‘द जंगल सागा’ की शूटिंग अबूझमाड़ में हुई थी, जिसमें चेंदरू मंडावी ‘मोंगली बॉय’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। बाद में देव आनंद, नूतन, मिथुन और नाना पाटेकर जैसे सितारे भी यहां शूटिंग कर चुके हैं।

✨ लौट रहा है सुनहरा दौर

अब शांति लौटने के साथ पर्यटन, फिल्म उद्योग और स्थानीय रोजगार तीनों को नए पंख मिले हैं। निर्देशक अविनाश प्रसाद के शब्दों में—“बस्तर अब सिर्फ हिंसा की कहानी नहीं बताएगा, बल्कि खूबसूरती, संस्कृति और उम्मीद की नई पटकथा लिखेगा।”

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Please enter comment in Japanese. (Anti-spam)

Back to top button
error: Content is protected !!