स्वास्थ्य

जी.पी. तलवार के 100वें वर्ष: वैज्ञानिक और संस्था निर्माता

डॉ. गुरसरन प्रसाद तलवार का जन्म 1926 में हिसार में हुआ था। 2 अक्टूबर को वे 100 वर्ष के हो गए। उन्होंने चिकित्सा शोध के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण योगदान दिए हैं। वे 1956 से AIIMS में रहे और भारत के पहले इम्यूनोलॉजी संस्थान की स्थापना की। उनका जीवन विज्ञान और चिकित्सा शोध के लिए समर्पित रहा।

जीवन और शिक्षा

तलवार के बचपन में कठिनाइयाँ थीं। उनकी मां जन्म के एक सप्ताह बाद ही चल बसीं। उनके पिता भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर से पोस्टग्रेजुएट थे और उन्होंने लाहौर में फार्मेसी चलाई। तलवार ने सरकारी कॉलेज लाहौर से बीएससी और एमएससी किया। 1947 में वे विभाजन के दौरान भारत आ गए। फिर उन्होंने फ्रांस के Pasteur Institute में डॉक्टरेट की डिग्री प्राप्त की।

फ्रांस में अध्ययन के बाद उन्होंने जर्मनी और इटली में पोस्टडॉक्टरेट किया। 1955 में वे भारत लौटे और शुरू में फार्मास्यूटिकल व्यवसाय शुरू करने का विचार था, लेकिन 1956 में AIIMS में एसोसिएट प्रोफेसर नियुक्त हुए। उन्होंने बायोकैमिस्ट्री विभाग को स्वतंत्र बनाया और हार्मोन पर शोध शुरू किया।

महत्वपूर्ण शोध और संस्थान स्थापना

तलवार ने 1970 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग से AIIMS में कुष्ठ और इम्यूनोलॉजी पर काम शुरू किया। उन्होंने पहले कुष्ठ रोग टीका का विकास किया, जो रोग को ठीक करता था और निशान भी कम करता था। इस टीका में उपयोग किए गए माइकोबैक्टेरियम का नाम Mycobacterium indicus pranii (MIP) था।

उन्होंने मानव प्रजनन हार्मोन पर आधारित गर्भनिरोधक टीका भी विकसित किया, जो सुरक्षित परीक्षणों से गुजा लेकिन अभी व्यावसायिक स्तर पर नहीं आया। यह टीका गर्भधारण को रोकता है बिना मासिक धर्म चक्र प्रभावित किए।

1983 में उन्होंने नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी (NII) की स्थापना की। इसका विचार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ चर्चा के बाद आया था, जिन्होंने देश में टीकों के विकास पर जोर दिया था। तलवार ने लंबे समय तक शोध जारी रखा और अनेक छात्रों का मार्गदर्शन किया।

सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने तलवार रिसर्च फाउंडेशन स्थापित की, जहां वे हार्मोन और एंटीजन पर शोध कर रहे हैं। उनका योगदान भारतीय चिकित्सा अनुसंधान क्षेत्र में अमूल्य माना जाता है। वे न केवल एक वैज्ञानिक बल्कि संस्था निर्माता और शिक्षक के रूप में भी याद किए जाते हैं।

डॉ. तलवार ने कभी अपने जीवन के फैसलों पर पछतावा नहीं जताया और नए शोध के लिए उत्साहित हैं, जो उनके समर्पण को दर्शाता है। उनका जीवन और उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

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