एच. पायलोरी खत्म करने से गैस्ट्रिक कैंसर रोकथाम संभव: नोबेल विजेता बैरी मार्शल

गैस्ट्रिक कैंसर के खतरे को कम करने के लिए हेलिकोबैक्टर पायलोरी (H. pylori) संक्रमण को समय रहते खत्म करना बेहद जरूरी है। नोबेल विजेता और गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. बैरी मार्शल ने इस बात पर जोर दिया है कि व्यापक जांच और सही उपचार से इस संक्रमण को समाप्त किया जाना चाहिए।
एच. पायलोरी का कैंसर से जुड़ाव और रोकथाम
डॉ. मार्शल, जिन्होंने 2005 में रॉबिन वार्न के साथ H. pylori की खोज के लिए मेडिकल में नोबेल पुरस्कार साझा किया था, ने बताया कि यह बैक्टीरिया केवल अल्सर का कारण नहीं है। लंबे समय तक संक्रमण से पेट में पुरानी सूजन होती है, जो गैस्ट्रिक कैंसर का जोखिम बढ़ा सकती है।
उन्होंने पीटीआई से बातचीत में कहा, “यह एक संभावित रोकथाम योग्य कारण है, इसलिए संक्रमण की पहचान करना और उसे खत्म कर देना जरूरी है।” डॉ. मार्शल भारत में विश्व गैस्ट्रोएंटेरोलॉजी कांग्रेस (WCOG 2026) में शरीक हुए थे, जो पहली बार भारत में आयोजित की गई।
वैश्विक दृष्टिकोण और चुनौतियां
इस चार दिवसीय सम्मेलन में 61 देशों के लगभग 3,000 प्रतिनिधि शामिल हुए, जहां H. pylori संक्रमण, गैस्ट्रिक कैंसर की रोकथाम, प्रारंभिक पहचान और उपचार पर चर्चा हुई। डॉ. मार्शल ने कहा कि वैश्विक स्तर पर “स्क्रीन-एंड-ट्रीट” कार्यक्रमों पर ध्यान बढ़ा है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने उन इलाके के लिए अनुशंसित किया है जहां लाभ संभावित नुकसान से अधिक हो।
डॉ. मार्शल ने कहा कि प्राथमिकता उन लोगों की पहचान करना और उनकी संक्रमण समाप्ति सुनिश्चित करना होनी चाहिए। यदि संक्रमण को पेट पर ज्यादा नुकसान पहुंचाने से पहले पकड़ा जाए तो कैंसर की संभावना को कम किया जा सकता है।
हालांकि, बढ़ती एंटीबायोटिक प्रतिरोध इस रणनीति के लिए बड़ी चुनौती बन रही है। उन्होंने कहा, “हम एक ही एंटीबायोटिक को बार-बार नहीं दे सकते। प्रतिरोध अलग-अलग देशों और क्षेत्रों में भी बदलता है, इसलिए उपचार स्थानीय प्रतिरोध पैटर्न के अनुसार होना चाहिए।”
IARC की गाइडलाइंस भी एंटीबायोटिक दवाइयों के उचित उपयोग, प्रतिरोधी पैटर्न के आधार पर उपचार और पुनः जांच पर जोर देती है। डॉ. मार्शल ने बताया कि भारत में H. pylori संक्रमण आम है और यह स्थानीय बैक्टीरिया स्ट्रेन और दवा प्रतिरोध की जानकारी जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने कहा, “भारत में बहुत बड़ी आबादी में ये संक्रमण पाया जाता है, यहां के अध्ययन से हमें कौन से स्ट्रेन सक्रिय हैं, कौन-सी दवाइयां प्रभावी हैं, और जांच व उपचार को सुलभ कैसे बनाया जा सकता है, इस पर जानकारी मिलेगी।” उन्होंने चेतावनी दी कि लक्षण सुधारने से ही उपचार की सफलता मान लेना गलत होगा, संक्रमण खत्म हुआ या नहीं, इसकी पुष्टि करना जरूरी है। अतः गैर-आक्रामक जांच विधियों से स्क्रीनिंग को बढ़ावा देना चाहिए।
डॉ. मार्शल द्वारा विकसित PYtest, एक 15 मिनट का गैर-आक्रामक C14 यूरिया ब्रेथ टेस्ट, मरीज के सांस के नमूने से सक्रिय संक्रमण का पता लगाने में मदद करता है। यह परीक्षण भारत में भी उपलब्ध है और डॉक्टरों के लिए आसान एवं प्रभावी साबित हो सकता है। गैस्ट्रिक कैंसर, जो खासतौर पर एशियाई क्षेत्रों में उच्च मात्रा में पाया जाता है, से बचाव के लिए यह महत्वपूर्ण कदम है।




