कंडाला सहकारी बैंक घोटाले में पूर्व अध्यक्ष न. भासुरंगन ने ऑडिट आंकड़ों में छेड़छाड़ का आरोप लगाया

कंडाला सेवा सहकारी बैंक के पूर्व अध्यक्ष न. भासुरंगन ने बैंक के 2020-21 के आडिट में जानबूझकर नुकसान बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का आरोप लगाया है। उन्होंने यह आरोप सोमवार को तिरुवनंतपुरम में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेन्स में लगाया। उनका कहना है कि इस आडिट में आंकड़ों में बदलाव करके बैंक को नुकसान में दिखाने की कोशिश की गई।
अनुसंधान और आरोप का संदर्भ
भासुरंगन के अनुसार, इस अवधि के राजस्व आय और खर्च के आंकड़े गड़बड़ाए गए हैं। वास्तविक रूप से बैंक की राजस्व आय ₹22.59 करोड़ थी और खर्च ₹19.12 करोड़ था, जिससे ₹3.47 करोड़ का ऑपरेशनल लाभ हुआ। लेकिन, ब्याज से मिलनी वाली ₹18.30 करोड़ की आय को राजस्व में शामिल नहीं किया गया। इसके साथ ही खर्च की तरफ फर्जी आंकड़े जोड़कर ₹89.57 करोड़ का कृत्रिम नुकसान दर्शाया गया।
उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में राजनीतिक उद्देश्यों के तहत इस तरह की मनगढ़ंत रिपोर्ट तैयार की गई है। उन्होंने कहा कि इस विवादित आडिट की समीक्षा के लिए सहकारी विभाग के निदेशक के सामने याचिका दायर की गई है, ताकि सही आंकड़ों के आधार पर लाभ-हानि और बैलेंस शीट तैयार की जा सके।
राजनीतिक और प्रशासनिक पहलू
भासुरंगन ने आरोप लगाया कि यह मामला पूरी तरह राजनीतिक प्रेरित था। केरल सहकारी सोसायटी अधिनियम की धारा 65 के तहत की गई जांच में बैंक का नुकसान ₹101 करोड़ बताया गया था। इस रिपोर्ट को पहले मीडिया में लीक किया गया था, जिसे लेकर अब राज्य सरकार के सामने एक अपील लंबित है। इस घटना के बाद अगस्त 2023 में बैंक की संचालक समिति को हटाकर प्रशासनिक समिति गठित की गई।
इस बैंक संकट के पीछे धोखाधड़ी के आरोपों की जांच के लिए प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी जांच कर रहा है। बैंक अधिकारियों के खिलाफ कई FIR दर्ज किए गए हैं, जिनमें जमाकर्ताओं को गुमराह करने का आरोप है।
मालूम हो कि मार्च में, जब केरल में पिछली LDF सरकार थी, सहकारी विकास एवं कल्याण कोष बोर्ड ने राज्य के आठ संकटग्रस्त सहकारी संस्थाओं को फिर से सुदृढ़ करने के लिए कुल ₹28.5 करोड़ का ऋण मंजूर किया था, जिसमें कंडाला सेवा सहकारी बैंक भी शामिल था।
भासुरंगन का दावा है कि बिना असली आंकड़ों के बनाई गई आडिट रिपोर्ट इस बैंक के अस्तित्व को खतरे में डाल रही है। यह विवाद सहकारिता क्षेत्र की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। बैंक प्रबंधन की जिम्मेदारी है कि सही वित्तीय स्थिति स्पष्ट कर सके।
यह मामला सहकारी बैंक के वित्तीय प्रबंधन और जांच तंत्र में पारदर्शिता की आवश्यकता को उजागर करता है। साथ ही, यह राजनीतिक हस्तक्षेप के प्रभाव को भी दर्शाता है जो सहकारिता संस्थानों की कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। इस मामले की अगली सुनवाई और जांच के परिणाम पर सारी नजरें टिकी हैं।




