पिछले 25 वर्षों में अधिकांश ग्रामीण कृषि मजदूर गैर-उत्पादक शहरी नौकरियों में गए

एक हालिया अध्ययन में पता चला है कि पिछले 25 वर्षों में कृषि क्षेत्र से शहरों में आए अधिकांश मजदूर गैर-उत्पादक और अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने लगे हैं। अध्ययन के अनुसार, इनमें से कई मजदूर ट्रांसपोर्ट और रेस्तरां जैसे क्षेत्रों में हैं, जहां उनकी उत्पादकता कृषि के समान या उससे कम है। यह स्थिति उनके जीवन और भारत की अर्थव्यवस्था पर कोई महत्वपूर्ण प्रभाव नहीं डाल पाई है।
कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों में उत्पादकता में अंतर
अध्ययन में यह भी बताया गया कि कृषि और अनौपचारिक गैर-कृषि क्षेत्रों के बीच उत्पादकता में अंतर बहुत कम या नगण्य है, खासतौर पर जब कार्यकाल, मानव पूंजी और मजदूरी की हिस्सेदारी को ध्यान में रखा जाता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के KLEMS डेटा के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि लगभग 63% से 75% गैर-कृषि मजदूर उन उद्योगों में हैं, जिनकी उत्पादकता औपचारिक कृषि से भिन्न नहीं है।
वहीं औपचारिक गैर-कृषि क्षेत्र में प्रति कर्मचारी मूल्य संवर्धन कृषि की तुलना में दो से तीन गुना अधिक पाया गया है। इसलिए, भारतीय अर्थव्यवस्था में असली संरचनात्मक अंतर उच्च उत्पादक औपचारिक क्षेत्र और निम्न उत्पादक अनौपचारिक क्षेत्र के बीच है, न कि केवल कृषि और गैर-कृषि के बीच।
श्रमिकों की गतिशीलता और जीवनस्तर
अध्ययन में यह भी बताया गया है कि कृषि और अनौपचारिक क्षेत्रों के बीच श्रमिकों की आवाजाही अपेक्षाकृत स्वतंत्र है। कृषि के मौसमी स्वाभाव के कारण बहुत से लोग रोजगार की तलाश में इन क्षेत्रों के बीच स्थानांतरित होते हैं। हालांकि गैर-कृषि क्षेत्र में अधिक काम के घंटे होते हैं, जिससे उत्पादकता में कुछ हद तक सुधार नजर आता है।
रिसर्चर राजीर जाट ने बताया कि सामान्यत: गैर-कृषि क्षेत्र अधिक उत्पादक होता है और कृषि श्रमिक जब उच्च उत्पादक क्षेत्रों में जाते हैं तो देश के जीवन स्तर में सुधार होता है। भारत में इस प्रक्रिया के लिए आवश्यक है कि शिक्षित और योग्य जनशक्ति को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, जिससे वे अधिक उत्पादक क्षेत्रों जैसे सूचना प्रौद्योगिकी और वित्तीय सेवाओं में कार्य कर सकें।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में कई श्रमिक रेस्तरां, निर्माण और अन्य निम्न उत्पादकता वाले अनौपचारिक क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जिसे कम करने की जरूरत है। इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा औपचारिक शिक्षा, विशेषकर कॉलेज डिग्री और अंग्रेजी भाषा की कमी है, जो अधिक उत्पादक क्षेत्रों के लिए आवश्यक हैं।
अध्ययन से यह भी सुझाव मिला है कि नीति-निर्माताओं को शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करना चाहिए ताकि ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों से आए मजदूरों को शहरों के उत्पादक क्षेत्रों में रोजगार मिल सके। इससे उनकी आयु और रोजगार की गुणवत्ता में सुधार होगा।
अंत में यह स्पष्ट है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास के लिए जरूरत है कि श्रमिकों को उच्च उत्पादक औपचारिक क्षेत्रों में स्थानांतरित किया जाए, न कि केवल असंगठित और कम उत्पादक गैर-कृषि क्षेत्रों में। इसके लिए नीतिगत सुधारों, बेहतर शिक्षा और कौशल विकास महत्वपूर्ण होंगे।




