पश्चिमी घाट के दो जिलों में प्रस्तावित ESA का बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र और संरक्षित क्षेत्र में शामिल

पश्चिमी घाट में प्रस्तावित पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) के मसौदे पर पाणी अर्थ फाउंडेशन ने काडागु और उदुपी जिलों में विस्तृत अध्ययन किया है। इस अध्ययन में केंद्र सरकार के मसौदे को समझने के साथ ही स्थानीय भूभाग, वन एवं संरक्षित क्षेत्रों के साथ इसके संबंध को दर्शाया गया है।
प्रस्तावित ESA और वर्तमान संरक्षण क्षेत्र
काडागु जिले में 54 गांवों को ESA में शामिल किए जाने का प्रस्ताव है। फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार प्रस्तावित ESA का लगभग 70.8% हिस्सा पहले से अधिसूचित वन, संरक्षित क्षेत्र या ईएसजेड (Eco-Sensitive Zones) में आता है, जबकि लगभग 30% क्षेत्र पहले से किसी भी संरक्षण क्षेत्र में नहीं है। उदुपी जिले की बात करें तो 35 गांव ESA के अंतर्गत प्रस्तावित हैं, जिनमें से लगभग 82% हिस्सा पहले से अधिसूचित वन, संरक्षित क्षेत्र या ESZ के अंतर्गत आता है।
दोनों जिलों में प्रस्तावित ESA क्षेत्र में अपार जल स्रोत मौजूद हैं, जो कावेरी और अरब सागर की ओर बहने वाली नदियों को जल प्रदान करते हैं। काडागु और उदुपी का यह क्षेत्र जल संरक्षण के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
ESA की सीमाएं और प्रतिबंध
कर्नाटक सरकार का मानना है कि ESA क्षेत्र केवल वन क्षेत्रों तक सीमित होना चाहिए, जिसमें प्लांटेशन, कृषि या आवासीय इलाके शामिल नहीं होने चाहिए। हालांकि, पाणी अर्थ फाउंडेशन के अनुसार ESA में किसी गांव की समावेश से पूरे गांव की भूमि वन भूमि नहीं बन जाती। मौजूदा ज़मीन की स्थिति और कानून लागू रहेंगे। कृषि, प्लांटेशन, और आवासीय गतिविधियों पर इस अधिसूचना में कोई प्रतिबंध नहीं है।
ESA के तहत खनन, बालू उत्खनन एवं खनिज निष्कर्षण पूरी तरह से प्रतिबंधित हैं। मौजूदा खदानों को पांच साल के भीतर या पट्टे की अवधि खत्म होने तक बंद करना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, कोई नया थर्मल पावर प्रोजेक्ट, रेड-श्रेणी के उद्योग, या बड़े पैमाने पर निर्माण परियोजनाएं अनुमत नहीं होंगी।
फाउंडेशन ने यह भी स्पष्ट किया है कि ESA क्षेत्र में रहते हुए स्थानीय लोग विस्थापन के जोखिम में नहीं हैं और उनके अधिकार और संपत्ति सुरक्षित रहेंगे। इसके अलावा, स्वास्थ्य सुविधाएं भी निरंतर चलती रहेंगी।
इस अध्ययन के माध्यम से ज्ञात हुआ कि पश्चिमी घाट के संरक्षण के प्रयासों में ESA नीति के मसौदे को स्थानीय भूभाग, वन क्षेत्र और जल स्रोतों के संदर्भ में समझना आवश्यक है। यह कार्रवाई पारिस्थितिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
कर्नाटक विधान सभा ने 22 सितंबर को कस्तुरीरंगन समिति की रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया है, परंतु ESA मसौदा अभी भी केंद्र की तरफ से सक्रिय है। पाणी अर्थ फाउंडेशन ने यह योजना बनाई है कि आगे अन्य जिलों पर भी इसी प्रकार के विश्लेषण जारी रखे जाएंगे ताकि ESA और वन संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे।
इस पहल से यह स्पष्ट होता है कि संरक्षण क्षेत्र की सीमाएं और प्रतिबंध कितने व्यापक या संकुचित होने चाहिए, इस पर बातचीत जरूरी है। पारिस्थितिक संवेदनशीलता के साथ ही स्थानीय समुदायों और विकास की जरूरतों को भी ध्यान में रखते हुए यह मुद्दा आगे बढ़ाया जाना चाहिए।




