धार्मिक

साक्षी भाव से जीवन को समझने का तरीका

हमारे मन पर बाहरी दुनिया के छोटे-छोटे घटनाएं भी गहरा असर डालती हैं। कुछ घटनाएं खुशी देती हैं, तो कुछ उदासी। कई लोग यह सोचते हैं कि इन दोनों भावनाओं के बीच संभल कर कैसे रहना संभव हो सकता है, जैसे कि कोई साक्षी हो।

हम सभी में यह क्षमता होती है कि हम खुद को एक दर्शक की तरह पीछे हटाकर देख सकें। लेकिन हम अक्सर इस क्षमता को पहचान नहीं पाते या इसका उपयोग नहीं करते। जब दूसरे लोग समस्याओं का सामना करते हैं, तो हम उनसे अलग होकर व्यावहारिक सुझाव देते हैं, पर जब वही समस्याएं हमें घेरती हैं, तो हम टूट जाते हैं। यह कमजोरी ‘मैं’ और ‘मेरा’ की भावना से उत्पन्न होती है।

गुरु और शिष्य का संवाद

एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, “गुरुजी, साक्षी भाव से सब कुछ देखना कठिन है, यह कैसे संभव है?” गुरु ने पहली बार कोई जवाब नहीं दिया। फिर गुरु ने कुछ गलतीओं का वर्णन करना शुरू किया, ये कहकर कि ये किसी और ने की हैं। शिष्य मुस्कुराते हुए सुनता रहा। अचानक गुरु ने कहा, “ये गलतियां तुमने ही की हैं।”

यह सुनकर शिष्य का चेहरा पीला पड़ गया और वह शर्मिंदगी से सिर झुका लिया। गुरु ने कहा, “जब मैंने गलतियां तुम्हारी बताई तो तुम उदास हुए, पर जब मैंने किसी और की गलतियां बताई, तब तुम साक्षी भाव से उसको स्वीकार कर पाये। इसका मतलब है कि तुम्हारे अंदर साक्षी होने की क्षमता है।”

साक्षी भाव का महत्व और अभ्यास

जब आप समझ जाते हैं कि जो ‘मैं’ या ‘मेरा’ समझा जाता है, वह आपका असली स्वरूप नहीं है, तभी आप साक्षी भाव को बुला सकते हैं। हमारे पास लगातार अपने विचारों और कार्यों को देखने की क्षमता होती है। यदि इस जागरूकता को हम बढ़ाकर रख सकें, तो हम हर परिस्थिति में साक्षीभाव के साथ सब कुछ स्वीकार कर सकेंगे, जिससे मन की शांति बनी रहेगी।

साक्षी भाव में सुख छिपा होता है। इसका मतलब यह नहीं कि भावनाएं नहीं आएंगी, बल्कि वे दूर से आती-जाती दिखाई देंगी, जिससे वे हमें प्रभावित नहीं कर पाएंगी। उदाहरण के लिए, जब क्रोध उभरता है, तब आप उसे स्पष्ट रूप से देख पाते हैं और यह समझने पर कि वह क्रोध है, आप शांत रह पाते हैं और उसे कर्म में परिणत नहीं होने देते।

जब आप इस संसार और इसके वस्तुओं के स्वभाव को समझते हैं, तो आप चीजों को वैसे ही स्वीकार करते हैं जैसे वे हैं। जैसे सागर में लहरें होती हैं, वैसे ही मन में विचार उभरते हैं। एक बार तैरना सीख जाने पर आप पानी में खुशी-खुशी उसकी लहरों के बीच तैर पाते हैं।

इस सत्य का अनुभव करें कि आप के अलावा और कुछ नहीं है और disturbance का कोई स्थान नहीं। आप सदैव शांत रहते हैं। वर्तमान में हम पूरी तरह से हमारे व्यक्तिगत मन से जुड़े हैं। हमें विस्तार करने की आवश्यकता है: व्यक्तिगत मन से लेकर सामाजिक मन तक और फिर पूरे ब्रह्मांड के मन तक। आप खुद को एक बीज समझ सकते हैं, लेकिन हर बीज में एक पेड़ छिपा होता है। इसे पहचानें और पेड़ बनें।

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