एनएफएचएस-6 में पोषण की चुनौतियों के बीच प्रगति की रिपोर्ट

नई दिल्ली, भारत – भारत के पोषण संबंधी कई गंभीर समस्याओं के मद्देनज़र बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं ही समाधान नहीं हैं। हालिया सर्वेक्षणों और शोधों से पता चलता है कि केवल स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार से देश के पोषण संकट का समाधान संभव नहीं है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों और वयस्कों में कुपोषण की समस्या को दूर करने के लिए पोषण के व्यापक कारकों पर ध्यान देना आवश्यक है, जिसमें खाद्य सुरक्षा, शिक्षा, स्वच्छता और सामाजिक-आर्थिक स्थिति शामिल हैं। स्वास्थ्य सेवाएं जैसे टीकाकरण, रोगनिदान और उपचार तो महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ये अकेले पोषण की जड़ समस्याओं को समाप्त नहीं कर सकतीं।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में पोषण स्तर में भारी अंतर है। विशेषकर गरीब परिवारों में उचित पोषण न मिलने से बच्चों के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसी कारण से सरकार ने बार-बार पोषण संबंधित योजनाएं लागू की हैं, जिनमें महिला और बाल विकास मंत्रालय की विभिन्न स्कीमें शामिल हैं।
आर्थिक और शिक्षा स्तर सुधारने के साथ-साथ स्वच्छता पर भी जोर देना आवश्यक है। कुपोषण का एक बड़ा कारण है पानी और भोजन की अस्वच्छता, जिससे संक्रमण बढ़ते हैं और पोषण का सही तरीके से अवशोषण नहीं हो पाता। इसलिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता, पोषण शिक्षा और जीवनशैली में बदलाव भी जरूरी है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) ने पिछले वर्षों में पोषण संकेतकों में कुछ सुधार दिखाए हैं, परंतु भारत को अभी भी लंबा रास्ता तय करना है। बाल मृत्यु दर में कमी, कुपोषण में गिरावट और मातृ स्वास्थ्य में सुधार की दिशा में प्रगति के बावजूद, न्यूट्रिशनल सुदृढ़ता के लिए एक समग्र एवं समन्वित प्रयास की सख्त जरूरत है।
अंततः, स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वच्छता, पोषण संबंधी जागरूकता और आर्थिक सशक्तिकरण को प्राथमिकता देने से भारत के पोषण संबंधी संकट को प्रभावी ढंग से संबोधित किया जा सकता है। इस बहुआयामी दृष्टिकोण के बिना केवल स्वास्थ्य देखभाल में सुधार से बड़े पैमाने पर परिणाम हासिल करना संभव नहीं होगा।



