क्या कला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से आगे बढ़ सकती है? सुधरानी रघुपथी का मानना है हाँ

नई दिल्ली, भारत। संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप से सम्मानित सुधरानी रघुपथी ने कला और तकनीक के मिश्रण पर गहराई से चर्चा की है। इस समय जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तेजी से विकसित हो रहा है, तब भी सुधरानी रघुपथी जैसे कलाकार मानवता के उस अनमोल तत्व को स्पष्ट रूप से सामने रख रहे हैं जो नृत्य जैसे शास्त्रीय कलाओं में अभिन्न होता है।
सुधरानी रघुपथी को उनकी कला में तल्लीनता और पारंपरिक नृत्य को नवीनता से जोड़ने के लिए जाना जाता है। उन्हें संगीत नाटक अकादमी द्वारा इस प्रतिष्ठित फेलोशिप से नवाजा गया है, जो भारत के कलाकारों के प्रति देश की गहरी श्रद्धा को दर्शाता है।
उन्होंने हाल ही में एक साक्षात्कार में बताया कि कैसे आधुनिक तकनीक ने कला जगत के तरीकों को बदला है, लेकिन नृत्य में वह मानव अनुभूति और भावनाओं का स्थान अब भी सर्वोपरि है। उनके अनुसार, जहां तकनीक नृत्य सीखने या प्रस्तुति के तरीकों को सहारा देती है, वहीं वास्तविक भाव-भंगिमा और आत्मा केवल इंसान के माध्यम से प्रकट हो सकती है।
“शब्दों के परे, नृत्य मन की भाषा है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नहीं समझ सकता,” सुधरानी ने कहा। उनका मानना है कि तकनीकी उपलब्धियां कला के एक नए अध्याय की शुरुआत करती हैं, लेकिन यह मानव रचनात्मकता और संवेदना के बिना अधूरी है।
सभी उम्र के श्रोताओं के बीच सुधरानी रघुपथी का अपार सम्मान और लोकप्रियता इसके प्रमाण हैं कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य आज भी जीवित और गतिशील हैं। उन्होंने बताया कि युवा पीढ़ी को पारंपरिक कला से जोड़ने के लिए तकनीक का सही तथा संतुलित उपयोग आवश्यक है।
संगीत नाटक अकादमी के इस सदस्य का कहना है कि नृत्य केवल शरीर की कला नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति है। आने वाले समय में वे ऐसी पहल करना चाहती हैं जो न केवल कला को संरक्षित करे बल्कि उसे नई ऊंचाइयों पर ले जाए।
संध्या गीतों के माध्यम से भावों को जीवित करने वाली सुधरानी रघुपथी ने स्पष्ट किया कि जहां तकनीक सहायक है, वहीं कला का भविष्य मानवता और व्यक्तिगत अनुभूति में निहित है। उनके इस विचार ने कला और तकनीक के बीच संतुलन की नई बहस छेड़ी है।
इस पहलू से, सुधारनी रघुपथी का संदेश स्पष्ट है: “कला और संस्कृति तब तक जीवित रहेंगे जब तक वे मानव हृदयों तक पहुँचेंगे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ऐसा नहीं कर सकता।”



