यूरोपीय संसद ने पाकिस्तान में हिंदू और ईसाई लड़कियों के जबरन धर्मांतरण पर जताई चिंता, निष्पक्ष जांच की मांग

नई दिल्ली, दिल्ली
पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के बाद अब यूरोपीय संसद ने भी एक प्रस्ताव पारित कर हिंदू और ईसाई समुदाय की नाबालिग लड़कियों के अपहरण, कथित जबरन धर्मांतरण और बाल विवाह की घटनाओं की कड़ी आलोचना की है।
यूरोपीय संसद ने कहा कि इस प्रकार की घटनाएं धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं की सुरक्षा और बच्चों के अधिकारों के विरुद्ध हैं। प्रस्ताव में पाकिस्तान सरकार से इन मामलों की निष्पक्ष जांच कराने, दोषियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करने और पीड़ित परिवारों को न्याय उपलब्ध कराने की मांग की गई है।
प्रस्ताव में 13 वर्षीय ईसाई लड़की मारिया शहबाज का मामला प्रमुखता से शामिल किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च महीने में उसका अपहरण किया गया और बाद में धर्म परिवर्तन कराने के आरोप लगे। यूरोपीय संसद ने इस घटना को गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन बताते हुए कहा कि ऐसे मामलों की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच होनी चाहिए।
यूरोपीय सांसदों ने यह भी कहा कि पाकिस्तान को अपने कानूनों का प्रभावी ढंग से पालन सुनिश्चित करना चाहिए ताकि बाल विवाह और जबरन धर्मांतरण जैसी घटनाओं पर रोक लग सके। साथ ही धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता बताई गई।
मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि पाकिस्तान में हर साल कई हिंदू और ईसाई परिवार अपनी बेटियों के अपहरण और धर्मांतरण के मामलों को लेकर न्याय की गुहार लगाते हैं। कई मामलों में परिवारों का आरोप होता है कि पीड़ित लड़कियों पर दबाव डालकर बयान दिलवाए जाते हैं।
यूरोपीय संसद ने यह भी कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है और किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। संसद ने पाकिस्तान से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का पालन करने की अपील की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय संसद का यह प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय समुदाय की बढ़ती चिंता को दर्शाता है। हालांकि यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन इससे पाकिस्तान पर नैतिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है।
अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि यदि इन मामलों में प्रभावी कार्रवाई होती है तो इससे अल्पसंख्यक समुदायों का विश्वास मजबूत होगा और मानवाधिकार संरक्षण की दिशा में सकारात्मक संदेश जाएगा।



