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खेल-तमाशा में खेल: एटा महोत्सव के ठेके पर सवाल, मौन क्यों हैं संगठन और जनप्रतिनिधि?

सब तक एक्सप्रेस।
एटा। एटा महोत्सव 2026 की शुरुआत के साथ ही इसके ठेके को लेकर जिले में सवालों और चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। आरोप है कि समय से हुआ ठेका पहले एटा निवासी शेषपाल मासाब को मिला था, लेकिन बाद में पर्दे के पीछे से प्रवेश कर रामपुर निवासी आवेद द्वारा ठेका निरस्त कराकर महेश्वरी फर्म के नाम करवा लिया गया। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर हिंदू संगठनों, जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों की चुप्पी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
बताया जा रहा है कि जिस भूमि पर वर्षों से मेला लगता रहा है, वह एक माह की लीज पर ली जाती है। पहले जहां मेला ठेका लगभग 20 लाख रुपये में निपट जाता था, वहीं अब यह बढ़कर करीब एक करोड़ 70 लाख रुपये तक पहुंच गया है। आरोप है कि ठेके की राशि में हुई इस भारी बढ़ोतरी का सीधा असर दुकानदारों और आम जनता पर पड़ रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि एटा रामलीला कमेटी भी हर वर्ष इसी मैदान पर मेला लगाती है और लाखों रुपये का ठेका देकर आय अर्जित करती है। ऐसे में सवाल उठता है कि एटा महोत्सव के ठेके में अचानक इतनी बड़ी वृद्धि कैसे हो गई।
आरोपों में यह भी कहा जा रहा है कि एटा महोत्सव का संचालन जिला प्रशासन के प्रभाव में हो रहा है और पुलिस चौकी व पुलिस बल भी बिना शुल्क के उपलब्ध कराया गया। वहीं खेल-खिलौने लगाने वाले दुकानदारों का आरोप है कि उनसे वसूली की जाती है और राशि न देने पर सामान जब्त कर लिया जाता है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि एटा एक पिछड़ा जिला है, जहां मजदूरी करने वाले लोग अपने बच्चों को मेला दिखाने आते हैं, लेकिन महंगे झूले, खिलौने और अन्य वस्तुएं उनकी जेब पर भारी पड़ती हैं। उनका आरोप है कि ठेके की ऊंची राशि का बोझ अंततः आम जनता पर ही डाला जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस पूरे मामले पर समाजसेवी संस्थाएं, जनप्रतिनिधि, सत्ताधारी दल और विपक्षी दल खुलकर सामने क्यों नहीं आ रहे हैं। भाजपा, विपक्षी दलों और जिले के सांसद की चुप्पी को लेकर भी चर्चाएं हैं।
एटा महोत्सव के ठेके से जुड़े वित्तीय लेन-देन और प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर अब आमजन जवाब मांग रहे हैं। जिले में यह चर्चा है कि आखिर इस ठेके से होने वाली कमाई में किस-किस का हिस्सा है और जनता की आवाज कब

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