शिक्षा

सुप्रीम कोर्ट में याचिका, ‘कोचिंग राज’ और नकली स्कूल नेटवर्क समाप्त करने की मांग

नई दिल्ली, भारत | 27 अप्रैल 2024

सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें अधिकारियों से parallel, unregulated और fee-driven private coaching व्यवस्था को समाप्त करने और राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं के पाठ्यक्रम और परीक्षण पैटर्न को राज्य द्वारा निर्धारित स्कूल पाठ्यक्रम के अनुरूप लाने का निर्देश देने की मांग की गई है। यह याचिका कोचिंग संस्थानों के बढ़ते प्रभाव और उनके कारण शिक्षा प्रणाली पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को लेकर अहम है।

याचिका में खुलासा किया गया है कि देश में मौजूद कई निजी कोचिंग संस्थान जिनका कोई नियामक नियंत्रण नहीं है, वे भारी फीस लेकर छात्रों को केवल परीक्षा केंद्रित सामग्री प्रदान करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि स्कूलों में पढ़ाए जा रहे पाठ्यक्रम से इनका तालमेल नहीं बैठता और छात्रों पर आर्थिक एवं मानसिक दबाव बढ़ता रहता है। इसमें यह भी चिंता व्यक्त की गई है कि यह व्यवस्था शिक्षा की गुणवत्ता और न्यायसंगत अवसरों के सिद्धांतों के खिलाफ है।

याचिका के माध्यम से कोर्ट से मांग की गई है कि वह एक ऐसा निर्देश जारी करे जिससे एक समान और पारदर्शी प्रणाली स्थापित हो। इसमें यह शामिल है कि कोचिंग संस्थानों को एक मानकीकृत ढांचे में लाया जाए जो उनके संचालन और फीस तय करने के तरीके को नियंत्रित करे। साथ ही राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं के पाठ्यक्रम को राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित स्कूल पाठ्यक्रम से मेल खाने के लिए संशोधित किया जाए ताकि छात्रों को असमान प्रतिस्पर्धा का सामना न करना पड़े।

विशेषज्ञों के अनुसार, कोचिंग संस्थानों के कारण शिक्षा प्रणाली में बढ़ती असमानताएं और लाखों परिवारों पर आर्थिक बोझ पड़ा है। कई छात्र अपनी मुख्य शिक्षा के साथ-साथ कोचिंग क्लासेज में भी समय और धन लगाने को मजबूर हैं। विशेषज्ञ मांग कर रहे हैं कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए इस पारदर्शिता और समन्वय की आवश्यकता अत्यंत जरूरी है।

शिक्षा मंत्रालय और अन्य संबंधित विभागों को निर्देशित किया गया है कि वे तालमेल बैठाएं और राज्य स्तरीय पाठ्यक्रम को राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षाओं से लिंक करने की प्रक्रिया शुरू करें। इस पहल से उम्मीद है कि शिक्षा का विकेंद्रीकरण संभव होगा और कोचिंग संस्थानों के गलत प्रभाव को कम किया जा सकेगा।

कोर्ट में दायर याचिका के बाद इस मामले में राष्ट्रीय शिक्षा नीति और केंद्रीय व राज्य सरकारों के लिए यह एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है। आगामी सुनवाई में इस विषय पर गंभीर चर्चा अपेक्षित है। शिक्षा क्षेत्र में सुधार और समान अवसरों की स्थापना के लिए सभी पहलुओं पर विचार किया जाना आवश्यक होगा।

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