मद्रास हाई कोर्ट ने ‘वेट्री पयानम’ योजना को असंवैधानिक घोषित करने वाली याचिका वापस ली

मद्रास हाई कोर्ट ने सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 को तमिलनाडु सरकार की ‘वेट्री पयानम’ योजना को असंवैधानिक घोषित करने वाली याचिका को वापस ले लिया। यह योजना राज्य में 12,695 सरकारी बसों के माध्यम से रोजाना 84.32 लाख महिलाओं को मुफ्त यात्रा सुविधा प्रदान करती है। याचिका एरोड़ जिले की एक निजी बस संचालिका ने दायर की थी।
याचिका वापसी और न्यायालय की टिप्पणियां
मुख्य न्यायाधीश सुष्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की फर्स्ट डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता एन. कलामानी को अन्य विधिक उपाय अपनाने की अनुमति देते हुए याचिका वापस करने की मंजूरी दी। न्यायधीनों ने यह सवाल उठाया कि कैसे याचिकाकर्ता पूरे राज्य में लागू योजना को चुनौती दे सकती हैं।
याचिकाकर्ता ने अपने निजी बस परमिट का जिक्र किया, जो एरोड़ से वेल्लिथिरुपुर तक 47 किमी व काकपालायम से अंधियूर तक 88 किमी की दूरी के लिए था। उन्होंने कहा कि मुफ्त यात्रा सुविधा सिर्फ सरकारी बसों पर थी, जिससे निजी बस ऑपरेटर्स को नुकसान उठाना पड़ रहा था। न्यायालय ने सुझाव दिया कि याचिका को केवल उन दो मार्गों तक सीमित रखना चाहिए था।
योजना की वैधता और सरकार की भूमिका
न्यायालय ने यह भी ध्यान दिलाया कि याचिका में केवल मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा विधानसभा नियम 110 के तहत की गई घोषणा और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा जारी विज्ञप्ति को चुनौती दी गई थी, परन्तु 2 अक्टूबर 2026 से लागू सरकारी आदेश को चुनौती नहीं दी गई थी, जो ‘वेट्री पयानम’ योजना के क्रियान्वयन का आधार था।
इन बिंदुओं को उजागर करने के बाद याचिकाकर्ता की पारिवारिक परिस्थितियों का वर्णन करते हुए बताया गया कि वह विधवा महिला हैं और दो बेटियों की परवरिश करती हैं। उन्होंने लगभग 15 कर्मचारियों को रोजगार दिया है, जिनके परिवार भी उनके व्यवसाय पर निर्भर हैं।
याचिकाकर्ता ने चिंता व्यक्त की कि सरकारी बसों की बहुलता के कारण उनके निजी बस मार्गों पर यात्रियों की संख्या में भारी गिरावट आ सकती है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ‘वेट्री पयानम’ योजना के लिए सालाना लगभग ₹6,000 करोड़ का भुगतान कर रही है, लेकिन इस सुविधा का विस्तार निजी बस ऑपरेटर्स तक नहीं किया गया।
तमिलनाडु बस ऑपरेटर्स संघ ने 22 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री से निजी ऑपरेटर्स के लिए भी योजना विस्तार की मांग की थी, लेकिन इसका कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि केवल सरकारी बसों पर योजना लागू करने से निजी ऑपरेटरों को बड़ा वित्तीय नुकसान होगा और वे अपने व्यवसाय बंद कर सकते हैं।
याचिका वापसी के बावजूद न्यायालय ने याचिकाकर्ता को नई याचिका दायर करने का अवसर देते हुए उसे अन्य विधिक विकल्प तलाशने की सलाह दी। यह मामला निजी बस ऑपरेटरों के हितों और राज्य की मुफ्त महिला यात्रा योजना के बीच संतुलन की चुनौतियों को दर्शाता है।




